आर्थिक विकास व समृद्धि के मामले में 18वीं सदी इंग्लैंड की रही तो 19वीं सदी अमेरिका और जर्मनी की। इनकी कामयाबी के पीछे अभिनव टेक्नोलॉज़ी के साथ ही निर्यात की अहम भूमिका थी। 20वीं सदी में एशिया के पांच देशों जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर व चीन ने निर्यात की बदौलत ही अपनी अर्थव्यस्था व नागरिक समृद्धि को चमकाया है। 21वीं सदी भारत की हो सकती है, बशर्ते वो विशाल घरेलू बाज़ार के दोहन के साथ ही निर्यात के मोर्चे पर झंडे गाड़ दे। लेकिन पहले उसे वो सब कुछ करना पड़ेगा, जो अन्य कामयाब देशों ने अब तक किया है। उसे विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, उन्नत शिक्षा, टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन, साफ-सुथरा सुचारु रूप से काम कर रहा फाइनेंशियल सिस्टम, सामाजिक शांति व समरसता और चहचहाता व लहराता निजी क्षेत्र बनाना होगा। यह काम सरकार को आर्थिक व सामाजिक नीतियों से हासिल करना होगा। उसका मकसद होना चाहिए: घरेलू उत्पादन व रोज़गार को बढ़ाना, आर्थिक विषमता को कम करना और क्षेत्रीय विकास को बढ़ाना। आज के दौर की मांग है कि वो पीएलआई या मेक-इन इंडिया जैसी स्कीमों से आर्थिक राष्ट्रवाद का महज दिखावा भर न करे, बल्कि सच्चा आर्थिक राष्ट्रवाद अपनाए। ट्रम्प जैसे घाघ का मुकाबला करना है तो उसे अपनी छद्म व विभाजक नीतियां छोड़नी पड़ेंगी। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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