कायदे से ठोंक-बजाकर चुनिए टीपीए

रमेश ने मेडिक्लेम ले लिया और खुद व अपने परिवार को सुरक्षित महसूस करने लगा। टीपीए क्या होता है, कौन-सा टीपीए होना चाहिए? यह सब न उनको उनके बीमा एजेंट ने बताया, न उन्होंने जानने की कोशिश की। उन्हें लगा कि व्यक्तिगत मेडिक्लेम से अच्छा है फेमिली फ़्लोटर मेडिक्लेम पॉलिसी लेना, सो ले लिया।

रमेश का सोचना बिल्कुल सही है कि फेमिली फ़्लोटर मेडिक्लेम पॉलिसी अच्छी है क्योंकि उस बीमा राशि का उपयोग परिवार का कोई भी सदस्य कर सकता है। रमेश ने फेमिली फ़्लोटर में कैशलेस स्कीम ली जिसके लिए उन्होंने कुछ ज्यादा प्रीमियम भी दिया कि जब भी आपात स्थिति आएगी तो कम से कम उन्हें अपनी जेब से भुगतान नहीं करना होगा।

एक दिन रमेश को कुछ समस्या हुई और अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। रमेश ने अपने टीपीए को 24 घंटे के अंदर ही खबर कर दी। लेकिन उनके टीपीए ने कैशलेस का फ़ायदा देने से इनकार कर दिया, वह भी बिना कारण बताए। रमेश को कहा गया कि आप अभी अपने खर्चे पर इलाज करवाइए और बाद में क्लेम करिए, तब भुगतान कर दिया जाएगा। रमेश विकट हालत में फंस चुका था, क्योंकि ये टीपीए  वाला झंझट उसे पता ही नहीं था और उसके पास उतना कैश भी नहीं था। खैर, जैसे-तैसे उसने इलाज के लिए नकद धन जुटाया और इलाज करवा लिया।

पॉलिसी के नियमानुसार उन्होंने निर्धारित समय में सारे कागजात टीपीए को भेज दिए और अपने क्लेम के भुगतान का इंतजार करने लगे। पर उनकी राह शायद उतनी आसान नहीं थी। टीपीए से क्लेम का भुगतान 15 से 45 दिन में हो जाना चाहिए जो कि बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए का नियम है। हालांकि बहुत ही कम क्लेम में ऐसा होता है। आम तौर पर टीपीए द्वारा बहुत परेशान किया जाता है या फ़िर क्लेम का भुगतान देने से मना कर दिया जाता है या क्लेम भुगतान में बहुत सारी चीजों का भुगतान रोक दिया जाता है।

रमेश को कागजात जमा करवाए लगभग डेढ़ महीना गुजर गया। पर क्लेम का भुगतान नहीं आया और न ही टीपीए की तरफ़ से कोई ऐसा पत्र कि उन्हें कोई जानकारी चाहिए या देरी होने की वजह क्या है। रमेश ने अपने एजेंट से बात की तो उसने भी हाथ खड़े कर दिए क्योंकि एजेन्ट के हाथ में भी कुछ नहीं था। क्लेम तो टीपीए को पास करना था। रमेश ने टीपीए से फ़ोन पर बात की तो पता चला कि फ़ाइल अभी डॉक्टर के पास से ही नहीं आई है। उन्हें एक सप्ताह का इंतजार करने को कहा गया और यह कि अगर उन्हें किसी कागजात की जरूरत होगी तो बता दिया जाएगा।

टीपीए से 45 दिन बाद रमेश को यह जबाब मिला है। उनकी मुश्किलों का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने इस विषय में बीमा कंपनी के प्रबंधक से बात की तो प्रबंधक ने उन्हें बताया कि व्यक्तिगत मेडिक्लेम में इनहाउस टीपीए होता है तो क्लेम का भुगतान 15-30 दिन में ही हो जाता है और चूंकि यह लोकल होता है तो बीमाधारक बीमा कंपनी में जाकर पूछताछ कर सकता है और प्रगति की जानकारी ले सकता है।

असल में आईआरडीए ने बहुत सारी कंपनियों को टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर) का लइसेंस दे रखा है। ये टीपीए नियमतः बीमाधारक और कंपनी के बीच की कड़ी होते हैं। लेकिन हकीकत में यह अस्पतालों के एजेंट बनकर रह गए हैं। इसलिए मेडिक्लेम लेने से पहले यह जान लें कि कौन सी टीपीए अच्छा है जो कि क्लेम का भुगतान समय पर करता है तो आप अपना टीपीए खुद भी चुन सकते हैं। पर अच्छा यही होगा कि बीमा कंपनी और बीमा प्लॉन चुनते समय  देख लें अगर इनहाउस टीपीए है तो बहुत ही अच्छा है। आईसीआईसीआई लोम्बार्ड और स्टार हेल्थकेयर जैसी कुछ कंपनियों ने अब इनहाउस टीपीए की शुरुआत कर दी है ताकि आप मेडिक्लेम से सुरक्षित भी रहें और क्लेम का भुगतान भी समय पर मिले।

सरकारी बीमा कंपनियां भी अपना स्वतंत्र टीपीए बनाने जा रही हैं। असल में टीपीए व अस्पतालों की मिलीभगत के चलते उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता है। बीमा कंपनियां केवल बीमा जारी करने तक की प्रक्रिया में ही शामिल होती हैं, कब क्लेम किया गया और कब उसका भुगतान कर दिया गया, यह उनको पता बाद में चलता है जब टीपीए से क्लेम भुगतान का पत्र बीमा कंपनियों के पास पहुंचता है। ये टीपीए कंपनियां, इसके पीछे बहुत बड़ा खेल चला रही हैं और बीमा कंपनियों को करोड़ों का चूना भी लगा रही हैं। यही वजह है कि मेडिक्लेम बीमा के क्षेत्र में बीमा कंपनियां इसी कारण से 300% की हानि में हैं। बीमा नियामक को इस तरफ़ ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

विवेक रस्तोगी (लेखक वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ हैं और कल्पतरु नाम से अपना ब्लॉग भी चलाते हैं। यह लेख उन्हीं के ब्लॉग से साभार लिया गया है)

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