जीवन और मृत्यु की शक्तियां बराबर हमें अपनी ओर खींचती रहती हैं। उम्र के एक पड़ाव के बाद मृत्यु हावी हो जाती है। तभी परख होती है हमारी जिजीविषा की कि मृत्यु के जबड़े से हम कितनी ज़िंदगी खींचकर बाहर निकाल लेते हैं।और भीऔर भी

किसी ने कुछ कह दिया। हम बिदक गए। यूं ही प्रतिक्रिया में जीते-जीते सारी जिंदगी कट जाती है। कभी ठहरकर यह तो सोचो कि तुम्हें खुद क्या पाना है, तुम्हारी मंज़िल क्या है? फिर ये सारा फालतू उछलना-कूदना थम जाएगा।और भीऔर भी

जो लोग कहीं किसी कोने में सिमटकर रहना चाहते हैं, उनके लिए यह दुनिया हमेशा छोटी बनी रहेगी। लेकिन जो लोग खुलकर जीना चाहते हैं, उनके लिए हर दिन चलें, तब भी एक ज़िंदगी छोटी पड़ जाती है।और भीऔर भी

जिंदगी की चाक पर शरीर को जिस तरह नचा दो, वो उसी तरह नाचने लगता है। वैसा ही स्वरूप, वैसा ही नियम-धरम अपना लेता है। कमाल तो यह है कि यहां कुम्हार भी हम हैं और नाचते भी हम ही हैं।और भीऔर भी

ज़िंदगी में कभी कमजोर, कायर व भीरु लोगों से नाता नहीं बनाना चाहिए। उन पर रहम करो, लेकिन दूर से। पास बैठा लिया तो सिर पर चढ़कर ऐसी चिल्ल-पों मचाएंगे कि आपका चलना ही दूभर हो जाएगा।और भीऔर भी

जीने के दो ही तरीके हैं। एक, दिए हुए हालात को जस का तस स्वीकार कर उसी में अपनी कोई जगह बना ली जाए। दो, हालात से ऊपर उठकर नई संभावनाओं को तजबीज कर उन्हें मूर्त रूप दे दिया जाए।और भीऔर भी

काम अपने लिए करने जाते हैं, पर करना दूसरों के लिए पड़ता है तो धीरे-धीरे हम खुद ही निर्वासित हो जाते हैं। फिर जो है, उसे बचाने के चक्कर में निर्वासन खिंचता जाता है और ज़िंदगी ही चुक जाती है।और भीऔर भी

पत्थर में न तो इच्छा होती है और न द्वेष। उसे न सुख होता है, न दुख। न ही पत्थर अपना रूप बनाए रखना चाहता है, जबकि ये अनुभूतियां ही प्राणियों की पहचान और उनके जीवन का मूल तत्व हैं।और भीऔर भी

ज़िंदगी इतनी अनिश्चित नहीं होती, दुनिया इतनी जटिल नहीं होती, लोग इतने कुटिल नहीं होते तो जीने में मज़ा ही क्या रहता! सब कुछ रूटीन, बेजान, एकदम ठंडा!! संघर्ष की ऊष्मा ही तो जीवन है।और भीऔर भी

जिंदगी में आफत नहीं, मोड़ और उतार-चढ़ाव ही आते हैं। यह एक दुस्साहस भरा सफर है। इसमें जो मोड़ या रास्ता आप चुनते हैं, वही आपकी किस्मत बनता है। ऊंच-नीच जीवन के एडवेंचर का हिस्सा भर है।और भीऔर भी