मोदी सरकार जनसंख्या घटाने की ‘देशभक्ति’ से पलटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से भाषण दिया था कि देश को जनसंख्या विस्फोट से निपटना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि जो लोग छोटा परिवार रख रहे हैं, वह भी एक प्रकार की देशभक्ति है। लेकिन 13 दिसंबर 2020 को मोदी सरकार इस ‘देशभक्ति’ से पलट गई। उसने देश में दो बच्चों का मानक लागू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के जवाब में हलफनामा देकर कहा है कि वह देश के नागरिकों पर जबरन परिवार नियोजन थोपने के विचार की विरोधी है। इस हलफनामे में बताया गया कि देश में कुल प्रजनन दर (टीएफआर, Total fertility Rate) लगातार घट रही है। इसलिए जबरन कोई उपाय थोपने की ज़रूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका भाजपा से जुड़े एक वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की थी। उपाध्याय ने पहले यह याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में डाली थी। वहां से खारिज होने के बाद वे सुप्रीम कोर्ट चले गए, जहां इसका जवाब देते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा कि, “अंतरराष्ट्रीय अनुभव दिखाते हैं कि बच्चों की संख्या सीमित रखने के लिए की गई जोर-जबरदस्ती के उल्टे नतीजे होते हैं। भारत में 2018 में जनगणना की प्रक्रिया के तहत किए गए सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के मुताबिक कुल प्रजनन दर (टीएफआर) घटकर 2.2 पर आ चुकी है, जबकि साल 2000 में जब राष्ट्रीय जनसंख्या नीति अपनाई गई थी, तब यह दर 3.2 हुआ करती थी।”

सरकार की तरफ से कहा गया, “परिवार कल्याण स्वैच्छिक किस्म का कार्यक्रम है जो किसी दम्पति को अपने परिवार के आकार का फैसला लेने और अपने माफिक परिवार नियोजन उपाय अपनाने में मदद करता है। यह उनके अपने चयन पर निर्भर है, न कि किसी तरह की बाध्यता पर।” हलफनामे में बताया गया कि चतुर्थ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे में भारत में अपेक्षित प्रजनन दर 1.8 रखी गई है, जबकि उस समय वास्तविक प्रजनन दर 2.2 थी। इससे साफ होता है कि पति-पत्नी औसतन 2 से ज्यादा बच्चे नहीं चाहते। साथ ही यह भी कि देश के 36 में से 25 राज्य व संघशासित क्षेत्र जनसंख्या में 2.1 या उससे कम का प्रतिस्थापन स्तर पहले ही हासिल कर चुके है।

सरकार का कहना है कि जनगणना के भी आंकड़े दिखाते हैं कि 2001 से 2011 का दशक पिछले 100 सालों में पहला दशक था, जब ठीक पिछले दशक से कम आबादी जुड़ी। जहां 1991 से 2001 के बीच देश की आबादी 21.54 प्रतिशत बढ़ी थी, वहीं 2001 से 2011 के दौरान यह बढ़त घटकर 17.64 प्रतिशत पर आ गई। हलफनामे में कहा गया, “इस समय भारत प्रजनन दर में प्रतिस्थापन का स्तर हासिल करने के मुहाने पर है। उसने मातृ व शिशु मृत्यु-दर घटाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत अपनी प्रतिबद्धता और दृढ़ता के साथ जनसंख्या को स्थिर करने और देश के विकसित करने का लक्ष्य हासिल कर सकता है।”

बता दें कि देश में जनसंख्या को नियंत्रित करने के कानून की मांग समय-समय पर उठती रही है। इसे बार-बार साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश भी होती रही है। भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ. अनिल अग्रवाल ने कोरोना काल के दौरान ही अगस्त 2020 में प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखकर आगामी संसद सत्र में जनसंख्या नियंत्रण बिल लाने का आग्रह किया था। उन्होंने चिट्ठी में कहा था कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जनसंख्या विस्फोट को तत्काल प्रभाव से रोकना जरूरी है और इसके लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाना ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन अब लगता है कि जिस भी किसी वजह से मोदी सरकार का रुख इस मसले पर पलट गया है।

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