सीख-समझ लें ऑप्शंस ट्रेडिंग यहां से

हमने ऑप्शन ट्रेडिंग की इस अध्ययन श्रृंखला में शुरू में जाना कि आईटीएम, एटीएम व ओटीएम ऑप्शन का क्या मतलब है, कॉल व पुट ऑप्शन क्या होते हैं, उन्हें खरीदने और बेचने में लाभ का फॉर्मूला क्या है, ऑप्शन राइटर या बेचने वाला ही ज्यादातर क्यों कमाता है, उसे कितना बड़ा मार्जिन देना पड़ता है, आज के ऑप्शन राइटर और कल के बदला फाइनेंसर में क्या समानता है, आदि-इत्यादि। सब कुछ उदाहरण के साथ समझते गए।

फिर इस मुद्दे पर आए कि ऑप्शन के भाव कैसे निर्धारित होते हैं, उन पर किन-किन चीजों का असर पड़ता है, कैसे देखा जाए कि ऑप्शन के भाव वाजिब हैं या नहीं। इसके लिए हमने ऑप्शन प्राइसिंग के दो प्रचलित मॉडलों को समझने की कोशिश की। पाया कि इसमें सबसे ज्यादा चलता है ब्लैक-शोल्स मॉडल। फिर इसकी बारीकियों में उतरते गए तो पता चला कि इसमें भी तमाम खामियां हैं और इससे जो भाव निकलते हैं, वे बाज़ार में चल रहे भाव से मेल नहीं खाते। इसकी बड़ी वजह है वोलैटिलिटी।

वोलैटिलिटी या चंचलता एक तरह का स्टैंडर्ड डेविएशन है जिसकी गणना स्टॉक या इंडेक्स के भावों में आ रहे हर दिन के अंतर के आधार पर आसानी से एक्सेल शीट पर की जा सकती है। खुद एनएसई भी इसमें दैनिक व सालाना वोलैटिलिटी के आंकड़े देता है। लेकिन ऑप्शन के भाव अतीत के मूल्यों के उतार-चढ़ाव के आधार पर निकाले गए स्टैंडर्ड डेविएशन नहीं, बल्कि मूल्यों की भावी चाल के अनुमान पर आधारित इम्प्लायड वोलैटिलिटी से निर्धारित होते हैं। अब हमारे लिए ब्लैक-शोल्स फॉर्मूले से ऑप्शन का भाव निकालना नहीं, बल्कि इम्प्लायड वोलैटिलिटी निकालना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया।

वैसे, अगर किसी को ऑप्शंस बेचने हों तो उसके लिए ब्लैक-शोल्स फॉर्मूले का काफी महत्व है क्योंकि उसी के आधार पर वह अलग-अलग स्ट्राइक मूल्य के कॉल व पुट ऑप्शन के दाम बोल सकता है। अब यह खरीदनेवाले पर है कि वह उनमें से किसको खरीदे। लेकिन हम इसकी तह में नहीं गए क्योंकि रिटेल ट्रेडर के पास आमतौर पर इतनी पूंजी नहीं होती कि वह ऑप्शन विक्रेता या ऑप्शन राइटर का बिजनेस कर सके। रिटेल ट्रेडर तो ऑप्शन खरीदने का बिजनेस कर सकता है क्योंकि उसमें प्रीमियम भर देना पड़ता है और मार्जिन वगैरह का कोई चक्कर नहीं होता।

यहां तक के अध्ययन से साफ हो गया कि ऑप्शन के भावों की गणना के लिए हमारे लिए इम्प्लायड वोलैटिलिटी का ज्यादा महत्व है। आज की हकीकत भी यही है कि ऑप्शन ट्रेडर इम्प्लायड वोलैटिलिटी के आधार पर ही ट्रेडिंग की अपनी रणनीति बनाते हैं। हमने यह भी समझने की कोशिश की कि निफ्टी के रोजाना के औसत रिटर्न और वोलैटिलिटी के आंकडों के आधार कैसे गणना की जा सकती है कि एक्सपायरी के वक्त उसका अधिकतम और न्यूनतम स्तर क्या हो सकता है। फिर जाना कि नॉर्मल डिस्ट्रीब्यूशन का नियम कैसे इन स्तरों के वास्तव में सही होने की कितनी प्रायिकता बताता है। यह थोड़ा कठिन मामला था। इसलिए इसे बाद में हम कभी गहराई से समझेंगे।

ऑप्शंस के भावों का सूत्र तलाशते-तलाशते हम इम्प्लायड वोलैटिलिटी तक पहुंच गए तो वहां से आगे बढ़ने पर ऑप्शंस ग्रीक्स से जा टकराए। ग्रीक प्रतीक ये बताते हैं कि किन बदलावों का क्या असर ऑप्शन के भावों पर पड़ सकता है। डेल्टा (Δ) यह दर्शाता है कि स्टॉक का मूल्य बदलने पर ऑप्शन का मूल्य कैसे बदलता है। थीटा (Θ) किसी ऑप्शन के भाव में समय के साथ होनेवाले बदलाव या उसकी समय संवेदनशीलता को दिखाता है। इसे ऑप्शन का समय क्षरण या time decay भी कहते हैं।

गामा (Γ) किसी ऑप्शन के डेल्टा और उसके स्टॉक के भाव के हो रहे बदलाव की दर को दर्शाता है। वेगा (v) किसी ऑप्शन के भाव और स्टॉक की इम्प्लायड वोलैटिलिटी के बीच बदलाव के रिश्ते को दिखाता है। यह वोलैटिलिटी के प्रति ऑप्शन की संवेदनशीलता का प्रदर्शित करता है। रौ (p) यह दिखाता है कि ब्याज दर में 1% बदलाव आने पर ऑप्शन का भाव कितना बदल सकता है। यह ब्याज दरों के प्रति ऑप्शन के भावों की संवेदनशीलता को दर्शाता है। इन सभी प्रतीकों की गणना ब्लैक-शोल्स मॉडल के आधार पर की जाती है। लेकिन यह ऑप्शन ट्रेडिंग का आगे काम आनेवाला काफी परिष्कृत तरीका है।

पढ़ने व सीखने के अगले दौर में हमने ऑप्शन ट्रेडिंग में अपनाई जानेवाली कुछ प्रमुख रणनीतियां की चर्चा की। ये थीं – कवर्ड कॉल, प्रोटेक्टिव पुट, बुल स्प्रेड, बियर स्प्रेड, बटरफ्लाई स्प्रेड, स्ट्रैडल और स्ट्रैंगल। बाद में हमने पाया कि इनमें से बटरफ्लाई स्प्रेड, स्ट्रैडल और स्ट्रैंगल में रिस्क को सबसे ज्यादा संभाल कर चला जाता है। फिर हमने इन तीन रणनीतियों को बाज़ार में निफ्टी ऑप्शंस पर लागू करने देखा। और, फिर कमाल हो गया क्योंकि तीनों की तीनों ही रणनीतियां जबरदस्त तरीके से कामयाब हो गईं। इनका एक और प्रयोग हमने कल किया है।

आपसे अनुरोध है कि 15 अप्रैल के बाद इस कॉलम में शुरू की गई लेखों की श्रृंखला को नए सिरे से पढ़ लें। हिंदी भाषा में ऐसी अध्ययन सामग्री आपको कहीं भी नहीं मिलेगी। साथ ही आप अगर साथ में जॉन सी. हल की किताब – Options, Futures, and Other Derivatives की पीडीएफ फाइल इंटरनेट से  मुफ्त में डाउनलोड कर पढ़ते रहे तो जल्दी ही आप ऑप्शंस ट्रेडिंग के मास्टर बन सकते हैं।

कल और परसों हम ऑप्शन ट्रेडिंग के दो अन्य पहलुओं पर चर्चा करेंगे। उसके बाद शुक्रवार को ऑप्शंस ट्रेडिंग की तीन रणनीतियों में इस बार किए गए सौदों की समीक्षा करेंगे कि वह कितनी कामयाब हुई हैं। फिर सोमवार से ट्रेडिंग बुद्ध की प्रीमियम सेवा अपने मूल स्वरूप में फिर से शुरू हो जाएगी।

 

 

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