जारी होंगे महंगाई की मार को बराबर करनेवाले बांड

भारत शायद दुनिया के उन गिने-चुने देशों में होगा, जहां मुद्रास्फीति की मार की भरपाई बैंक बचत खाते पर दिए जानेवाले ब्याज से नहीं करते। ज्यादातर बैंक ग्राहकों को उनकी बचत पर महज चार फीसदी ब्याज देते हैं, जबकि मुद्रास्फीति की दर सात से दस फीसदी चल रही है। इसीलिए लोगबाग बैंक खाते में धन रखने के बजाय सोने या जमीन-जायदाद में लगा रहे हैं। वित्त मंत्री चिदंबरम ने आम बजट में इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए मुद्रास्फीति से जुड़े बांड लाने की पेशकश की है।

उनका कहना था कि रिजर्व बैंक के साथ सलाह-मशविरे के बाद ऐसे बांड लाने का प्रस्ताव है जो गरीब व मध्य वर्ग के लोगों की बचत को मुद्रास्फीति के असर से बचाएंगे। ये ऋण प्रपत्र मुद्रास्फीति इनडेक्स्ड बांड (आईआईबी) या मुद्रास्फीति इनडेक्स्ड नेशनल सिक्यूरिटी सर्टिफिकेट हो सकते हैं। इनका विवरण बाद में घोषित किया जाएगा।

मालूम हो कि रिजर्व बैंक की तरफ से पहले भी इस दिशा में पहल हो चुकी है। लेकिन वह कामयाब नहीं हुई। अभी कुछ दिनों पहले ही रिजर्व बैंक के गवर्नर दुव्वरि सुब्बाराव ने माना था कि पहले के आईआईबी की डिजाइन में कुछ समस्या रह गई थी, जिसकी वजह से वो कामयाब नहीं हुआ। अब भी सवाल उठता है कि हम इन बांडों को थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति से जोड़ेंगे या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति से? सीपीआई पर आधारित मुद्रास्फीति 10 फीसदी से ऊपर चल रही है तो हमें इन बांडों पर ब्याज दर इतनी ही रखनी पड़ सकती है। बता दें कि जनवरी, 2013 में थोक मूल्य की मुद्रास्फीति 6.58 फीसदी रही है, जबकि उपभोक्ता मूल्यों की मुद्रास्फीति की दर 10.79 फीसदी दर्ज की गई है।

बुधवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक वित्तीय आस्तियों (बैंक डिपॉजिट, जीवन बीमा, शेयर, डिबेंचर, बांड वगैरह) में आम लोगों की बचत का निवेश 1990 के दशक में 55 फीसदी था। लेकिन 2011-12 तक यह घटकर 36 फीसदी पर आ गया। दूसरी तरफ 2011 में भारत में सोने की मांग 933 टन की थी, जिसमें से 40 फीसदी मांग निवेश के लिए थी।

प्रामेरिका एसेट मैनेजमेंट कंपनी में फिक्स्ड इनकम विभाग के प्रमुख महेंद्र जाजू का कहना है कि डब्ल्यूपीआई या सीपीआई के प्रकाशित आंकड़ों से आम उपभोक्ता द्वारा महसूस की गई मुद्रास्फीति काफी अलग हो सकती है। एक किसान पर महंगाई की मार इन सरकारी आंकड़ों से भिन्न है। वास्तविक आर्थिक परिस्थिति और बताई जानेवाली स्थिति में काफी अंतर है। इसलिए बांडों की ब्याज को आम उपभोक्ता पर पड़ रहे असर से जोड़ पाना काफी मुश्किल साबित होगा।

खैर, जो भी अड़चन आए। पर, धन के समय मूल्य को बचत पर दिए जानेवाले ब्याज से बराबर करना जरूरी है। नहीं तो आम लोगों की बचत पर बैंक और वित्तीय संस्थाएं यूं ही मौज करती रहेंगी। यह बाजार के मौजूदा व स्थापित पैमाने पर गलत ही नहीं, बल्कि सरासर लूट है।

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