एंट्री अहम, पर मार्जिन भी महत्वपूर्ण

मित्रों! मेरा मकसद न तो आपको टिप्स देना है और न ही आपसे कमाई करना। मेरा पहला मकसद है उन सूचनाओं की खाईं को भरना जो अंग्रेज़ी जाननेवालों को आसानी से मिल जाती हैं, जबकि हिंदी जगत अंधेरे में टटोलता रहता है। यही हाल मराठी और अन्य भारतीय भाषाएं बोलने वालों का है। दूसरा मकसद है अंग्रेज़ी जाननवाले भी जिन जटिलताओं से घबराते हैं, उन्हें सुलझा देना। अब ट्रेडिंग की ऐसी ही कुछ उलझनों को सुलझाने के सूत्र…

कुछ दिन पहले झारखंड से यह सेवा लेना चाह रहे एक निवेशक/ट्रेडर ने बताया कि वे मूविंग एवरेज़ और बोलिंजर बैंड का उपयोग करते हुए ट्रेड करते हैं। कुछ लोग और मिले जो एमएसीडी, आरएसआई और एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (ईएमए) का इस्तेमाल करते हैं। अभी संक्षेप में बता दूं कि ट्रेडिंग के ऐसे धुरंधर लोग जो लोग महीने में लाख रुपए तक कैश सेगमेंट में कमा रहे हैं, वे आमतौर पर कुल जमा चार संकेतकों का इस्तेमाल करते हैं। पहला स्टॉक का रुझान या ट्रेंड पता करने के लिए 5, 10 व 13 दिन के ईएमए और 50, 75, 100, 200, 300, 365 दिनों के सिम्पल मूविंग एवरेज (एसएमए)।

दो, ओवरबॉट या ओवरसोल्ड स्थिति का पता करने के लिए आरएसआई (रिलेटिव स्ट्रेन्थ इंडेक्स)। तीन, दैनिक या साप्ताहिक भावों के चार्ट में कैंडल का पैटर्न। और चार, डिमांड-सप्लाई ज़ोन यानी भावों के किस दायरे में संस्थागत निवेशकों की खरीद-बिक्री आने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। इनमें से तीन संकेतक आपको बड़ी आसानी से एनएसई और बीएसई की साइट पर मिल जाते हैं। चौथे को देखने के लिए अलग दृष्टि विकसित करनी पड़ती है। इसे सीखना और पकड़ना बड़ी कठिन विद्या और कला है। लेकिन समझ में आ जाए तो मामला बहुत आसान हो जाता है। हम कोशिश में लगे हैं कि यह दुलर्भ विद्या व कला सभी हिंदी पाठकों को अर्थकाम के मंच पर उपलब्ध करा दें ताकि ट्रेडिंग में घाटा खाने की गुंजाइश कम से कम हो जाए। यह करीब पांच-छह महीने का अभियान है। इसके बारे में फिर कभी।

दोस्तों! ट्रेडिंग के लिए हम सभी ऐसा सौदा चाहते हैं जिसमें न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न की प्रायिकता (probability) या गुंजाइश काफी ज्यादा हो। लेकिन ऐसे सौदे पकड़ में आ भी गए तो सबसे अहम मसला होता है कि आप एंट्री किस भाव पर लेते हैं। अगर एंट्री सही नहीं हुई तो सौदे से बाहर निकलने से लेकर धन प्रबंधन का अनुशासन भी गड़बड़ा जाता है। इसलिए एंट्री का बिंदु बहुत सोच-समझकर तय करना चाहिए। अक्सर हम एंट्री का भाव इतना नीचे रख लेते हैं कि शेयर वहां तक आता ही नहीं और अच्छा सौदा हमारे हाथ से निकल जाता है। वहीं कभी-कभी सौदे को हर हाल में पकड़ने के लिए एंट्री इतनी ऊपर रखते हैं कि मुनाफे का मार्जिन घट जाता है।

असल में मुनाफे के मार्जिन की भी बड़ी महत्ता है। इसी के साथ जुड़ा मसला है कि हम सौदे में किस स्तर पर बाहर निकलें ताकि हमारा लाभ अधिकतम हो सके। लेकिन इससे भी अहम है कि हम किन सौदों को हाथ लगाएं। इसका मापदंड यह है कि हमारे मुनाफे का ज़ोन बड़ा होना चाहिए। एंट्री से लेकर लक्षित भाव की दूरी से बनता है यह ज़ोन या दायरा। यह दायरा तय करने के लिए हमें चार्ट पर देखना पड़ता है कि स्टॉक में कहां पर जमकर खरीद हुई और वो चढ़ता गया। इसके बाद कब बिक्री शुरू हुई और यह गिरते-गिरते कहां तक चला गया। ट्रेडिंग के लिए निर्धारित अवधि (दिन, हफ्ते, महीने या साल, कुछ भी) में उच्चतम व न्यूनतम भाव का दायरा बताता है कि आप कहां से कहां तक मार कर सकते हैं।

इस दोनों ही बिंदुओं पर खरीदने या बेचने की तगड़ी होड़ होती है। इसलिए हमें इस होड़ के सघन से होने से पहले सौदे में घुसना होता है। लेकिन हम न्यूनतम या उच्चतम भाव को अपना एंट्री और एक्जिट बिंदु नहीं बना सकते। उससे थोड़ा-ऊपर नीचे का भाव ही हम व्यवहार में पकड़ सकते हैं। मगर, सौदा हमारी गणना पर सटीक बैठेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए हमें हमेशा स्टॉप लॉस लगाकर चलना चाहिए।

अब हमारे पास तीन बिंदु हो गए – स्टॉप लॉस, एंट्री और एक्जिट या निकलने का भाव। मान लीजिए कि हमंने ऐसे सौदे को चुना जिसमें एंट्री से एक्जिट की दूरी तीन और स्टॉप लॉस से एंट्री तक की दूसरी एक की है। इस तरह इस सौदे में हमारा रिस्क/रिवार्ड अनुपात 1:3 का हुआ है। जाएगा तो एक रुपया और मिलेगा तो तीन रुपया। असली सवाल कि कितनी गुंजाइश है कि इस सौदे में आप मुनाफा कमा ही लेंगे? इस प्रायिकता या गुंजाइश को बढ़ाने का नियम यह है कि आप 1:3 रिस्क/रिवार्ड अनुपात के सौदे के लिए ऐसा सौदा चुनें जिसमें चार्ट 1:4 का अनुपात दिखा रहा हो। इसी तरह अगर आप 1:4 का अनुपात पाना चाह रहे हों तो ऐसा सौदा चुनें जिसका चार्ट 1:5 का अनुपात दिखा रहा हो। बल्कि ज्यादा सुरक्षित दांव यह रहेगा कि आप 1:3 का अनुपात पाने के लिए वो सौदा चुनें जिसमें चार्ट 1:5 का अनुपात दिखा रहा होगा।

अगर किसी सौदे में एक खोकर कम से कम तीन पाने का मौका न हो, इतना मार्जिन न दिखे तो उसे हाथ नहीं लगाना चाहिए। मोटी-सी बात है कि ट्रेडिंग सिर्फ ट्रेडिंग के लिए नहीं, बल्कि कमाने के लिए की जाती है और जिसमें ज्यादा कमाई की गुंजाइश न हो, उस सौदे पर समय और धन बरबाद करने का क्या फायदा। लेकिन ध्यान रखें कि डिमांड ज़ोन और सप्लाई ज़ोन के अंतर से बनता है प्रॉफिट ज़ोन। और, इन तीनों की शिनाख्त आसान नहीं है। लेकिन हम इन्हें भी एक दिन आपके लिए आसान बना देंगे। आमीन! तथास्तु!!

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