डेरिवेटिव्स में भी चले डिमांड-सप्लाई

डेरिवेटिव ट्रेडर बहुत उस्ताद किस्म के प्राणी होते हैं। वे सबसे कम समय में कम से कम रिस्क उठाते हुए ज्यादा से ज्यादा संभव रिटर्न कमाने की जुगत में लगे रहते हैं। वे इसका हवाई ख्वाब नहीं देखते, बल्कि ठोस, समझदार, दमदार कोशिश करते हैं। हालांकि बाज़ार में ज़ीरो रिस्क जैसी कोई चीज़ नहीं होती। और, रिस्क ऐसी तितली नहीं जिसे आप मुठ्ठी में बंदकर रख लें। यहां रिस्क कभी भी बैलून की तरह विस्फोटक हद तक बढ़ सकता है। आप जिसे न्यूनतम समझते है, वह अचानक अधिकतम हो सकता है। यह अनिश्चितता ही रिस्क की रूह है।

ट्रेडर कैसे संभालते या साधते हैं डिरेवेटिव ट्रेडिंग के रिस्क को? डेरिवेटिव ट्रेडर का बराबर साबका एक शब्द से पड़ता है। वो है मार्केट वायड पोजिशन लिमिट (Market Wide Position Limits) या एमडब्ल्यूपीएल। आखिर यह क्या बला है? असल में इस बला का ज्ञान ट्रेडर को ज्यादा मुनाफा कमाने में मदद कर सकता है। इसलिए इसे जान लेने में कोई नुकसान नहीं। वैसे तो यह सीमा केवल स्टॉक्स के डेरिवेटिव सौदों पर लगती है और इंडेक्स डेरिवेटिव्स पर नहीं। फिर भी इसकी अवधारणा को समझ लेना ठीक रहेगा। हम डेरिवेटिव्स में केवल इंडेक्स ऑप्शंस और उसमें भी निफ्टी व बैंक निफ्टी ऑप्शंस भी फोकस कर रहे हैं। फिर भी बाज़ार से जुड़े जितने ज्यादा पेंच समझ लेंगे, उतना ही ज्यादा दूसरी गुत्थियों को सुलझाना आसान हो सकता है।

अगर आप शेयर बाज़ार में सक्रिय हैं तो शायद आप फ्री फ्लोट का मतलब समझते होते हैं। इसका मतलब होता है कि कंपनी के कितने शेयर ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध हैं। मान लीजिए कि किसी कंपनी की कुल चुकता या पेड-अप पूंजी 100 करोड़ रुपए की है और उसके 55 प्रतिशत शेयर प्रवर्तकों के पास हैं तो उसका फ्लोटिंग स्टॉक या फ्री फ्लोट 45 करोड़ रुपए का हुआ। इसमें अगर शेयर एक रुपए अंकित मूल्य का है तो उसके अधिकतम 45 करोड़ शेयर ही ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध होंगे। अधिकतम इसलिए कहा कि प्रवर्तकों से बचे और पब्लिक के हिस्से में दर्ज 45 प्रतिशत शेयरों में भी कुछ संस्थाएं लंबे समय के लिए निवेश करके रखती हैं तो फ्री फ्लोट की गिनती करते वक्त उनका हिस्सा निकाल दिया जाता है।

हम आज जिस मार्केट वायड पोजिशन लिमिट या एमडब्ल्यूपीएल की चर्चा कर रहे हैं, वह डेरिवेटिव सौदों में काम आती है, लेकिन उसका सीधा ताल्लुक किसी भी कंपनी के फ्री फ्लोट से है। असल में यह लिमिट कंपनी के फ्री फ्लोट की 20 प्रतिशत निधार्रित की गई है। मसलन, एसीसी के कुल जारी शेयरों की संख्या 17.799 करोड़ है। इसके 54.53 प्रतिशत शेयर प्रवर्तकों के पास हैं और बाकी 45.47 प्रतिशत पब्लिक के पास। इसलिए इसका फ्री फ्लोट 8.548 करोड़ शेयरों का हुआ तो इसकी एमडब्ल्यूपीएल अधिक से अधिक 1,70,95,811 शेयरों की हो सकता है। एनएसई की वेबसाइट पर एसीसी की मार्केट वायड पोजिशन लिमिट लगभग हमारी गणना के बराबर 1,70,78,428 की दी हुई है।

डेरिवेटिव ट्रेडिंग में इस मार्केट वायड पोजिशन लिमिट का महत्व यह है कि सारे ट्रेडरों के सौदों को मिला दें तो एसीसी में सभी ऑप्शन और फ्यूचर सौदों में शामिल शेयरों की संख्या 1,70,78,428 से ज्यादा नहीं हो सकती। स्टॉक एक्सचेंज हर दिन घोषित करते हैं कि इसमें कितने शेयरों के सौदे हुए पड़े हैं। इस संख्या को ओपन इंटरेस्ट कहा जाता है। मसलन, कल एसीसी में ओपन इंटरेस्ट 23,97,100 शेयरों का था। इस तरह उसमें आज एफ एंड ओ में ट्रेड के लिए उपलब्ध शेयरों की संख्या 1,46,81,328 बच गई। हालांकि एनएसई ने यह संख्या 1,38,27,406 बता रखी है। खैर, इतने अंतर की वजह कोई न कोई बारीक गणना होगी।

कुछ ट्रेडर मार्केट वायड पोजिशन लिमिट को अपनी रणनीति में इस्तेमाल करते हैं। जिस स्टॉक की यह लिमिट ज्यादा बची होगी, उसमें उतनी ही अधिक मांग आ सकती है। उसे खरीदनेवाले ज्यादा आएंगे तो बेचनेवाले भी उसी तादाद में आएंगे क्योंकि ट्रेडिंग ज़ीरो-सम गेम है और इसमें हर खरीदार के साथ कोई न कोई बेचनेवाला संलग्न होता है। इसी के साथ ओपन इंटरेस्ट का आंकड़ा जुड़ा होता जो कभी भी मार्केट वायड पोजिशन लिमिट से ज्यादा नहीं हो सकता। ओपन इंटरेस्ट किसी स्टॉक में फ्यूचर्स व ऑप्शंस की खड़ी पोजिशन या सौदों की संख्या को दिखाता है। इसे इन सौदों में शामिल शेयरों की संख्या से भी दिखाया जाता है। किसी स्टॉक के डेरिवेटिव में ओपन इंटरेस्ट एक्सचेंज द्वारा निर्धारित उसकी मार्केट वायड पोजिशन लिमिट से ज्यादा नहीं हो सकता। कोई इस सीमा को तोड़ता है तो उस पर एक्सचेज जुर्माना लगा देता है।

डेरिवेटिव सेगमेंट में ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध सारे स्टॉक्स (एनएसई में 144) में बची हुई मार्केट वायड पोजिशन लिमिट का औसत निकालकर देखा जा सकता है कि बाज़ार में अभी कुल कितनी डिमांड या मांग है और वहां रिस्क की तात्कालिक स्थित क्या चल रही है। मान लीजिए कि बाज़ार 3 प्रतिशत बढ़ रहा है, जबकि सभी स्टॉक्स की मार्केट वायड पोजिशन लिमिट का औसत 2 प्रतिशत ही बढ़ा तो इसका मतलब होगा कि लोगों ने ज्यादा शेयर खरीदे हैं भले ही डेरिवेटिव सेगमेंट में। इससे संकेत मिलता है कि शेयरों की खरीद जारी रह सकती है और अगले दिन भी शेयर बाज़ार बढ़ सकता है।

वहीं, अगर किसी दिन बाज़ार या निफ्टी मान लीजिए 5 प्रतिशत बढ़ता है, लेकिन बची हुई मार्केट वायड पोजिशन लिमिट 2 प्रतिशत घट जाए तो इसका मतलब यह होगा कि हो सकता है कि उसी दिन कुछ पोजिशन ली गई हो, सौदे किए गए हों जो अगले दिन काटे जा सकतें है, उनमें मुनाफावसूली की जा सकती है। इसलिए बाज़ार अगले दिन गिर सकता है। हालांकि ये सब संभावनाएं हैं, प्रायिकता है। ऐसी ही होगा, ऐसा पक्का नहीं कहा जा सकता। लेकिन बाज़ार की भावी दिशा का संकेत तो बची हुई मार्केट वायड पोजिशन लिमिट दे ही देती है।

इसी तरह, अगर बाज़ार गिर रहा हो औ औसत मार्केट वायड पोजिशन लिमिट बढ़ रही हो तो उसका मतलब होगा कि लोग बाज़ार के और गिरने के अंदेशे में शॉर्ट सौदे किए जा रहे हैं। वहीं बाज़ार के गिरने के दौर में अगर मार्केट वायड पोजिशन लिमिट भी घट रही हो तो उससे संकेत मिलता है कि शॉर्ट पोजिशन अब कवर की जा रही है और बाज़ार बढ़ सकता है। होता यह है कि जब डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी होती है चाहे वो साप्ताहिक हो या महीने की, तब मार्केट वायड पोजिशन लिमिट अनिवार्य रूप से घटती है और नया चक्र शुरू होने के पहले दिन यह बढ़ जाया करती है। गुरुवार को गिरना और शुक्रवार को बढ़ जाना। यह इसका अनिवार्य चक्र है।

मार्केट वायड पोजिशन लिमिट की स्थिति पर नज़र रखने से पता चलता है कि ट्रेडर का रुझान क्या चल रहा है। इससे शेयरों के लिए ही नहीं, बल्कि समूचे बाज़ार में चली रही डिमांड और सप्लाई की स्थिति, उनमें बन या बिगड़ रहे संतुलन का पता चलता है। इस जानकारी का उपयोग स्मार्ट ट्रेडर मुनाफा कमाने के लिए करते रहते हैं।

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