बढ़ा आदित्य बिड़ला केम का दम

लॉटरी खेलनेवाले के कपड़े उतर जाते हैं, बचा-खुचा भी बिक जाता है। लेकिन लॉटरी खिलानेवाला हमेशा चांदी काटता है। इसी तरह शेयर बाज़ार में कानाफूसी और टिप्स पर चलनेवाले कंगाल हो जाते हैं, लेकिन इन टिप्स और कानाफूसियों को चलानेवाले हमेशा मौज करते हैं। शेयर बाजार में स्वार्थी तत्वों या साफ कहें तो ठगों का बड़ा गैंग बैठा है जो टिप्स का जाल फेंककर हम-आप जैसी छोटी मछलियों का शिकार करता है। हमें उनकी बातों के बजाय अपने विवेक और रिसर्च पर भरोसा करना सीखना पड़ेगा। नहीं तो बेहतर है कि हम एफडी, पीपीएफ या सरकारी बांडों में निवेश तक ही खुद को सीमित रखें। इससे हम मुद्रास्फीति के असर को भले ही न मेंट सकें, लेकिन हमारा मूलधन देखने में तो बचा रहेगा।

संदर्भवश आपको याद दिला लूं कि जून 2010 में जब से सेबी का यह नियम आया कि जून 2013 तक निजी क्षेत्र की लिस्टेड कंपनियों में पब्लिक की हिस्सेदारी कम से कम 25 फीसदी हो जानी चाहिए या दूसरे शब्दों में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 75 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, तभी से हल्ला उठाया गया कि बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियां पब्लिक को 25 फीसदी हिस्सेदारी देने के बजाय खुद को डीलिस्ट कराना पसंद करेंगी। छोटे-मोटे ब्रोकरेज हाउसों को छोड़ दीजिए, आईसीआईसीआई सिक्यूरिटीज जैसी बड़ी फर्म तक ने इस पर पूरी रिपोर्ट निकाल डाली कि कैसे ऐसी कंपनियों में निवेश से नोट बनाए जा सकते हैं। तर्क यही था कि डीलिस्ट कराने पर कंपनियां शेयरधारकों को बाजार की बनिस्बत कहीं ज्यादा मूल्य देंगी। लेकिन अब, जबकि अंतिम तिथि छह महीने ही दूर रह गई है, सारे हो-हल्ले की हकीकत सामने आ गई है। जिन कंपनियों ने डीलिस्टिंग की पेशकश भी की, उनके ऑफर मूल्य बाजार भाव से काफी कम रहे हैं। आम निवेशक ठगा जा चुका है। रोने के लिए कोई कंधा भी उसके पास नहीं बचा है।

ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियां डीलिस्टिंग का इरादा छोड़ चुकी हैं। ऐसा होना ही था। कारण बड़ा साफ है। वे भारत जैसे व्यापक और तेजी से उभरते बाजार को छोड़ नहीं सकतीं। यहां रहना है तो धंधे के लिए बराबर पूंजी की जरूरत पड़ेगी। पूंजी जुटाने के दो ही साधन हैं ऋण और इक्विटी। ऋण के लिए बैंक लोन या बांड जारी करना महंगा पड़ता है। वहीं, इक्विटी के लिए कुछ डिस्क्लोजर करो, सेबी के पास दस्तावेज जमा कराओ, इश्यू के मैनेजमेंट पर खर्च करो और करोड़ो रुपए पब्लिक आपको दे देगी, जिस पर आपको लाभांश तक देने की कोई बाध्यता नहीं है। इसमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जो साख है, उसे देखते हुए पब्लिक से पूंजी जुटाना उनके लिए बाएं हाथ का काम है। ऐसे में पूंजी जुटाने का इतना सस्ता व सुलभ साधन कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी भला छोड़ भी कैसे सकती थी?

आज स्थिति यह है कि डिसा इंडिया, हनीवेल ऑटोमेशन व ब्लू डार्ट जैसी कंपनियों ने डीलिस्टिंग के बजाय प्रवर्तकों की हिस्सेदारी घटाने का फैसला किया है। रीको इंडिया ने डीलिस्टिंग की कोशिश तो की, लेकिन नाकायाब रही। एस्ट्राज़ेनेका फार्मा इंडिया, 3एम इंडिया व टिमकेन इंडिया जैसी कंपनियों में उहापोह जारी है। इस बीच साल भर के भीतर 60 से 90 फीसदी बढ़ चुके इनके शेयर डीलिस्टिंग का भूत उतरने के बाद नीचे गिरने लगे हैं। एस पी तुलसियान जैसे विश्लेषक जिस केन्नामेटल को पहले इस साल फरवरी में 990 रुपए के आसपास और अप्रैल में 1200 रुपए के आसपास खरीदने की सलाह दे रहे थे और दावा कर रहे थे कि वो कुछ महीने में 1800 तक चला जाएगा, वह शेयर अब 796 रुपए तक गिर चुका है। इन ‘विश्लेषकों’ ने इस साल जनवरी के बाद इस शेयर को तब उठाना शुरू किया था, जब वो 640.80 रुपए की तलहटी पकड़ चुका था।

एसएमसी ग्लोबल के जगन्नाधन तुनगुंटला ने मंगलवार 20 नवंबर को हनीवेल ऑटोमेशन को डीलिस्टिंग का आदर्श मामला बताया और इस स्टॉक को होल्ड रखने की सलाह दी। अगले ही दिन बुधवार 21 नवंबर को यह शेयर 20 फीसदी के निचले सर्किट तक गिर गया क्योंकि कंपनी ने डीलिस्टिंग का इरादा छोड़ दिया था। यह शेयर 14 दिसंबर 2011 को 1620 रुपए की तलहटी पर था। लेकिन 19 नवंबर 2012 3391 रुपए के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गया। अगले ही दिन तुनगुंटला इसे बेचने के बजाय होल्ड करने की सलाह देते हैं! अभी यह शेयर वहां से करीब 1000 रुपए गिरकर 2396 रुपए पर आ चुका है। आखिर किसके हित में ये ‘विश्लेषक’ काम कर रहे हैं? जबाव साफ है। आपको भी पता है। इसलिए बताने की जरूरत नहीं।

कहने का अभिप्राय यह है कि बिजनेस चैनल से लेकर विश्लेषक तक सनसनी फैलाकर शेयर बाजार से खटाखट मुनाफा कमाने की सलाह देते हैं। एक दिन या कुछ दिन। दिन भर सलाहों को फेंटते रहते हैं। कोई जवाबदेही नहीं। हम-आप फंस जाते हैं क्योंकि हम असल में निवेशक हैं ही नहीं। हम खुद सब-ब्रोकर या ट्रेडर हैं। रिटेल निवेशक तो बहुत-बहुत दूर जा चुका है। बचे हम तो हम ही इनकी गिद्ध सलाहों का शिकार हो रहे हैं। हमें खुद निवेशक बनना चाहिए और निवेशकों का ही ध्यान रखना और करना चाहिए। इसके लिए हमारी सोच कम से कम छह महीने या साल भर की होनी चाहिए।

यह सोच रखेंगे तो आपको अर्थकाम की सलाहों की अहमियत समझ में आएगी। जैसे हमने 8 अप्रैल 2010 को इसी कॉलम में आदित्य बिड़ला केम में निवेश की सलाह दी थी। तब इसका दस रुपए अंकित मूल्य का शेयर 86.60 रुपए पर था। छह महीने बाद अक्टूबर 2010 में 136.70 रुपए और अगले महीने नवंबर 2010 में 155.90 रुपए तक पहुंच गया। 80 फीसदी से ज्यादा का फायदा। फिर गिरने लगा तो दिसंबर 2011 में 67.25 रुपए की तलहटी पकड़ ली। फिलहाल शुक्रवार 14 दिसंबर 2012 को बीएसई (कोड – 500057) में 101.40 रुपए और एनएसई (कोड – ABCL) में 101.20 रुपए पर बंद हुआ है। निवेश से नोट कमाने के लिए क्या चक्र रखना चाहिए, यह आप इस उदाहरण से समझ सकते हैं।

इस कंपनी में इस वक्त किया गया निवेश भी फलदायी हो सकता है। असल में अप्रैल 2011 में आदित्य बिड़ला समूह की इस कंपनी ने कनोरिया केमिकल्स की क्लोरोकेमिकल डिवीजन को 830 करोड़ रुपए में खरीद लिया। इससे कंपनी पर ऋण का बोझ जरूर बढ़ा। लेकिन उसका धंधा भी काफी बढ़ चुका है। देश के कॉस्टिक सोड़ा बाजार में अब कंपनी की हिस्सेदारी 22 फीसदी हो गई है, जबकि अभी तक 18 फीसदी बाजार हिस्सेदारी के साथ गुजरात एल्कली एंड केमिकल्स नंबर एक पर थी। अधिग्रहण के बोझ के नकारात्मक प्रभावों से कंपनी अब मुक्त हो चुकी है। इसीलिए पिछले एक महीने में ही उसका शेयर 87 रुपए से 107 रुपए यानी 22.98 फीसदी बढ़ चुका है। यह शेयर थोड़ा नीचे 85-90 की रेंज में आ जाए तो इसमें दो साल के नजरिए से निवेश करना काफी लाभप्रद होगा। क्यों और कैसे, बताने लगूंगा तो लेख और लंबा हो जाएगा। हमने इशारा कर दिया। आप खुद निवेश करने से पहले तहकीकात या रिसर्च करने की आदत डालिए। आगे फिर फायदा ही फायदा है।

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