रिजर्व बैंक की तिरगुन फांस

पिछले दो सालों से दुनिया भर की सरकारों और केंद्रीय बैंकों के लिए मुसीबत बना संकट अब लगभग मिट चुका है। अब हमें उन चुनौतियों पर ध्यान देने की जरूरत है जिनसे हमें आगे के सालों में जूझना है। तय-सी बात है कि औद्योगिक देश अब धीमे विकास के दौर में प्रवेश कर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत लगातार मजबूत हो रहा है और भविष्य में अच्छी प्रगति की संभावना है। हमारी घरेलू बचत दर बढ़कर जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की लगभग 35 फीसदी और घरेलू निवेश दर 37 फीसदी के आसपास हो चुकी है। हमारे पास बेहद उद्यमी निजी क्षेत्र है जिसने दिखा दिया है कि वह दुनिया के बाजार में सॉफ्टवेयर ही नहीं, पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी होड़ ले सकता है। हमारे पास बेहतर क्वालिटी की उच्च शिक्षा से लैस भरपूर मानव संसाधन हैं। यह निस्संदेह आज की दुनिया में हमें फायदे की स्थिति में ला खड़ा करता है। हम भौगोलिक रूप से उस महाद्वीप में हैं जो आर्थिक अहमियत हासिल करता जा रहा है और आनेवाले सालों में विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख सारथी बनता नजर आ रहा है।

मुझे यकीन है कि हम 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के अंत तक फिर से 9 फीसदी विकास दर हासिल कर सकते हैं और बाद में इससे बेहतर भी कर सकते हैं। इसलिए मैंने योजना आयोग से कहा है कि वह 12वीं पंचवर्षीय योजना में 10 फीसदी विकास दर हासिल करने की संभावना तलाशे। इसे पाने के लिए कई नीतिगत बदलाव करने होंगे। मैं इनमें से संक्षेप में उनकी चर्चा करता हूं जिनका ताल्लुक रिजर्व बैंक से है।

तेज और सबको शामिल करनेवाले विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमारी मौद्रिक व वित्तीय नीतियों में तीन अहम पहलू रखने होंगे। एक, सुनिश्चित करना होगा कि मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहे क्योंकि यह आम आदमी पर सबसे ज्यादा चोट करती है और आर्थिक संकेतों का मतलब बिगाड़ देती है। दो, बैंकिंग व वित्तीय व्यवस्था के स्थायित्व को सुनिश्चित करना होगा, नहीं तो वित्तीय संकट आने का अंदेशा बढ़ जाता है जो हमेशा वास्तविक अर्थव्यवस्था से भी भारी कीमत वसूलता है। तीन, इन नीतियों को तेज और सबको साथ लेकर चलनेवाले विकास के अनुरूप वित्तीय तंत्र की जरूरत को पूरा करना होगा।

हम राजकोषीय घाटे (मोटे तौर पर केंद्र सरकार की बाजार उधारी) को सीमित करने का प्रयास कर रहे हैं। 2009-10 में यह जीडीपी का 6.8 फीसदी था जिसे 2010-11 में 5.5 फीसदी और अगले दो सालों में 2012-13 तक घटाकर 4.1 फीसदी किया जाना है। अगर राजकोषीय लक्ष्य हासिल कर लिए जाते हैं तो मौद्रिक नीति के लिए मुद्रास्फीति पर काबू पाना आसान हो जाएगा। राजकोषीय घाटा अधिक रहता है तो मौद्रिक अनुशासन मुद्रास्फीति पर अंकुश रखने में मदद करता है, लेकिन उस नकारात्मक असर को नहीं रोक पाता जो भारी सरकारी उधारी के चलते निजी निवेश के लिए (वित्तीय) संसाधनों की उपलब्धता या दीर्घकालिक ब्याज दरों पर पड़ता है। यह दोनों ही बातें विकास के लिए बहुत मायने रखती हैं।

असल में, जो अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी प्रवाह के लिए खुली हो, उसमें राजकोषीय असंतुलन के बीच मौद्रिक अनुशासन कड़ा करना ब्याज दरों को और बढ़ा सकता है जिससे विदेशी पूंजी का आना और बढ़ जाएगा। नतीजतन, विनिमय दर पर दबाव पड़ेगा (रुपया और महंगा हो जाएगा) और अर्थ-प्रबंधन पहले से ज्यादा कठिन हो जाएगा। मौद्रिक अनुशासन, विदेशी पूंजी का आना और विनिमय दरों का स्थायित्व एक ऐसा त्रिगुण फांस बनाती है जिससे निकलना असंभव हो जाता है। इसीलिए ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां बाहर से पूंजी आती जा रही हो, वहां आप स्थिर विनिमय दर और स्वतंत्र मौद्रिक नीति को एक साथ नहीं हासिल कर सकते। तलवार की धार पर चलनेवाले इस बेहद नाजुक काम की जिम्मेदारी भारतीय रिजर्व बैंक पर है। हालांकि उसका काम थोड़ा आसान इस सच से हो जाता है कि अभी तक हमने पूंजी खाते को पूरी तरह खोला नहीं है और बाहर से ऋण, खासकर अल्पकालिक ऋण के आने पर बंदिशें लगी हुई हैं। पूंजी खाते को खोलने की रफ्तार को लेकर हमारी सावधानी एक सचेत फैसला है और इस रुख को जारी रखने के वाजिब कारण हैं।

दूसरा पहलू वित्तीय स्थायित्व को सुनिश्चित करने की जरूरत का है। इस सिलसिले में हम हाल के वैश्विक संकट से अहम सबक सीख सकते हैं। वित्तीय नियमन इस तरह बनाए जाने चाहिए कि अतिशय जोखिम को किनारे रखा जा सके क्योंकि बैंकों को चक्रीय बदलावों से अपनी बैलेंस शीट को बचाना होता है। हमें खासकर नियमन के उन कमजोर नुक्तों पर नजर रखनी होगी जो व्यवस्थागत जोखिम पैदा कर सकते हैं। ऐसे सभी मसलों पर विश्व स्तर पर फाइनेंशियल स्टैबिलिटी बोर्ड (एफएसबी) में गौर किया जा रहा है। ये बोर्ड वित्तीय नियमन का स्वीकार्य ढांचा विकसित करने का प्रमुख बहुपक्षीय फोरम है। जी-20 के पूर्ण सदस्य होने के नाते हम इस बोर्ड में शामिल हैं और उसमें देश का प्रतिनिधित्व भारतीय रिजर्व बैंक करता है। उसे सुनिश्चित करना पड़ेगा कि हमारी चिंताएं व सरोकार एफएसबी के मंच पर अच्छी तरह सामने आएं।

अब मैं तीसरे पहलू या मकसद पर आता हूं। यह है ऐसी वित्तीय व्यवस्था बनाना जो सर्वहिताय व द्रुत विकास से जुड़े मध्यवर्ती तंत्र की जरूरतों को पूरा करे। यह एक मायने में हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। हमारी वित्तीय प्रणाली स्थिर साबित हुई है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इसे सुधारने व धार देने की जरूरत नहीं है। कभी-कभी मैं इस तरह की बातें सुनता हूं कि हमारा अलगाव ही हमें बचा ले गया और हमें इसे क्षेत्र में प्रयोग करने व इसे ज्यादा उदार बनाने से बचना चाहिए। मुझे लगता है कि यह संकट से निकाला गया गलत सबक है। हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हमारी परिस्थिति में नए वित्तीय तौर-तरीके अहमियत नहीं रखते।

अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए हमारा बैंकिंग व वित्तीय तंत्र अब भी अपेक्षाकृत छोटा है। हमने जिस तरह की ऊंची आर्थिक विकास दर का लक्ष्य बना रखा है, उसमें सहयोग करने के लिए बहुत सारे पक्ष है जिन्हें इस प्रणाली में शामिल करना होगा। विकास की यह ऊंची दर उस परिवेश में हासिल की जाएगी जब भारत दुनिया के लिए खुला होगा और भारतीय कंपनियां विश्व स्तर पर कामकाज करेंगी। भविष्य में विदेशी मुद्रा के जोखिम का प्रबंधन हमारी बढ़ती हुई महत्वपूर्ण चिंता बन जाएगा और हमारी वित्तीय प्रणाली को भारतीय कंपनियों को वे साधन उपलब्ध कराने होंगे जिनसे वे वाजिब लागत पर ऐसे जोखिम को नांथ सकें।

इसी तरह तेज विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में व्यापक निवेश की जरूरत है और इसका अधिकांश हिस्सा दीर्घकालिक ऋणों से पूरा होगा। बैंक इस तरह के दीर्घकालिक ऋण के आदर्श साधन नहीं हैं। इसलिए देश में कॉरपोरेट ऋण बाजार का विकास किया नितांत जरूरी है। इसके लिए भी सचेत कार्य योजना की दरकार है।

अंतिम बात। अगर विकास को सर्वहिताय होना है तो बैंकिंग को और भी ज्यादा लोगों तक पहुंचना होगा। सूचना प्रौद्योगिकी और मोबाइल बैंकिंग जैसी नई टेक्नोलॉजी ने बैंकिंग तंत्र के विस्तार की गुंजाइश को काफी बढ़ा दिया है। हमारी बैंकिंग प्रणाली को कभी भी किसानों, छोटे व मझोले उद्योग और दूसरे प्राथमिकता क्षेत्रों की ऋण जरूरतों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। हमें आम आदमी तक वित्तीय समावेश का लाभ पहुंचाने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है।

– प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा 1 अप्रैल 2010 को रिजर्व बैंक के प्लैटिनम जुबली समारोह में दिए गए भाषण के प्रमुख अंश। डॉ. मनमोहन सिंह 1982 से 1985 तक रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके हैं।

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