बीमा कंपनी का भला सोचा तो लेने के देने पड़ गए

यह किसी आम आदमी का नहीं, बल्कि हिंदुस्तान टाइम्स समूह के बिजनेस अखबार मिंट के डिप्टी एडिटर स्तर के खास आदमी का मामला है। उनका नाम क्या है, इसे जानने का कोई फायदा नहीं। लेकिन उनके साथ घटा वाकया जानने से बीमा उद्योग का ऐसा व्यावहारिक सच हमारे सामने आता है जो साबित करता है कि इस उद्योग में निहित स्वार्थों का ऐसा नेक्सस बना हुआ है जिसका मकसद बीमा उद्योग या कंपनी का विकास नहीं, बल्कि अपने निजी हितों को पूरा करना है। यह काम भ्रष्टाचार की तोहमत झेलनेवाले सरकारी क्षेत्र में नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र में भी हो रहा है। दिक्कत यह है कि इस मामले में बीमा नियामक संस्थान आईआरडीए भी कुछ नहीं कर सकता क्योंकि इसमें एक पक्ष ऐसा है जो उसके नियंत्रण से बाहर है।

हाल ही में स्वास्थ्य बीमा पर हुए एक वर्कशॉप में इस वरिष्ठ व अनुभवी संपादक ने अपने साथ हुआ वाकया खुद बयान किया। पूरा किस्सा यूं है कि उनकी पत्नी के दांतों में गंभीर समस्या थी तो उन्हें अस्पताल में दिखाने गए। पढ़े लिखे हैं, बैंकिंग से लेकर बीमा तक की समझ रखते हैं। जागरूक हैं तो ऑफिस की ग्रुप मेडिक्लेम पॉलिसी के अलावा अलग से भी स्वास्थ्य बीमा कवर ले रखा है। उन्हें यह भी मालूम है कि दांतों का कोई इलाज हेल्थ इंश्योरेंस में कवर नहीं किया जाता। लेकिन अस्पताल के डॉक्टर ने उन्हें बताया कि अगर एनेस्थीसिया देने के बाद आपका इलाज किया जाता है और आप अस्पताल में 24 घंटे से ज्यादा भर्ती रहते हैं तो आपको इलाज खर्च का पूरा क्लेम मिलेगा।

सो, डॉक्टर को दिखाने के बाद उनकी सलाह पर उन्होंने अपनी पत्नी को अस्पताल में भर्ती करा दिया। दाढ़ का ऑपरेशन हुआ। मुंह में काफी सूजन आ गई थी। डॉक्टर ने सलाह दी कि पत्नी को दस दिन अस्पताल में ही रखें। उनको भी लगा कि अभी जिस तरह चेहरा सूजा हुआ और भयानक लग रहा है उसमें बच्चे मम्मी को देखकर परेशान हो जाएंगे। इसलिए जब तक सूजन उतर न जाए, तब तक पत्नी को अस्पताल में ही रखा जाए। तीन दिन में चेहरा पुराने ढर्रे पर आ गया। वे ऑफिस से अस्पताल यही कोई रात के साढ़े दस बजे पहुंचे। डॉक्टर से बोले कि अब डिस्चार्ज कर दीजिए। आराम ही करना है तो घर पर कर लेंगी। कितना बिल बना है बता दीजिए।

डॉक्टर बोला है ठीक है। बिल की चिंता आप मत कीजिए। अभी तैयार करवा देते हैं। आपको कुछ भी नहीं देना है। बस उस पर साइन कर दीजिएगा। इसके बाद अस्तपाल के दो-चार कर्मचारी यहां-वहां दौड़े। खर्च जोड़ा। बिल जुटाए। बीमा कंपनी से जुड़े टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर) के यहां फैक्स किया। यही कोई 50 मिनट में सारा काम हो गया। कागजात संपादक जी के सामने थे। उन्हें उस पर बस दस्तखत करने थे। लेकिन उन्होंने बिल की राशि देखी तो चौंक गए। दांत के सामान्य इलाज और अस्पताल में तीन दिन रहने का खर्च था 45,000 रुपए।

संपादक जी के अंदर का न्यायप्रिय इंसान जागा। उनको लगा कि ज्यादा क्लेम लेकर वे दूसरों का हिस्सा छीन रहे होंगे। फिर जितना असल में बनता है, बीमा कंपनी से उतना ही क्लेम लिया जाए। उन्होंने अस्पताल के अधिकारियों से कहा कि यह बिल तो बढ़ा-चढ़ा है। अस्पताल वालों ने कहा कि इसकी चिंता आप क्यों करते हैं? आपकी जेब से तो कुछ जा नहीं रहा! लेकिन वे अड़े रहे। बोले कि मुझे असली खर्च का बिल दो, मैं उसका भुगतान आपको करता हूं। असली बिल निकला 26,000 रुपए का। लेकिन अस्पताल वालों ने कहा कि वे न तो चेक से लेंगे, न ही क्रेडिट कार्ड से। उन्हें सारा पैसा कैश चाहिए। संपादक महोदय क्या करते। रात के पौने बारह बजे दो बैंकों के एटीएम से रकम निकाली और अस्पताल को बिल चुकाकर पत्नी को लेकर घर पहुंचे।

सोचा था कि बाद में बीमा कंपनी से क्लेम भर कर ले लेंगे। लेकिन कागजात व बिल बीमा कंपनी को भेजे तो उसने क्लेम देने से मना कर दिया। कहा कि वे दांतों के इलाज का क्लेम नहीं देते। उन्होंने डॉक्टर का ज्ञान दोहराया कि अस्पताल में भर्ती होने पर एनेस्थीसिया देकर किया गया दांतों का इलाज हेल्थ इंश्योरेंस में कवर्ड है। लेकिन बीमा कंपनी ने उनकी एक न सुनी। उन्होंने अपने एजेंट से भी संपर्क साधा। उसने भी दो-टूक अंदाज में कह दिया कि आपने बेकार में पंगा लिया। आपको कुछ नहीं मिल पाएगा। क्या घट जाता जो आप अस्पताल की मान लेते! आपका भी फायदा होता और दूसरों का भी। खैर, तीन महीने की लिखंत-पढ़ंत के बाद कुछ नहीं मिला तो संपादक जी ने दिल मसोसकर 26,000 रुपयों को डूबा समझ लिया।

जब एक निजी क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनी के अधिकारी से मैंने पूछा कि क्या टीपीए, अस्पताओं और बीमा कंपनी के लोगों के बीच का यह स्वार्थी गठजोड़ तोड़ा नहीं जा सकता? क्या आईआरडीए इसे रोकने का उपाय नहीं कर सकता? तो, उनका कहना था कि सामान्य बीमा कंपनियों का मंच, जनरल इंश्योरेंस काउंसिल हर बीमारी के खर्च का मानकीकरण कर रही है। आईआरडीए के अधिकार क्षेत्र में बीमा कंपनियां और टीपीए तो आते हैं, लेकिन अस्पतालों पर उसका निर्देश नहीं चलता। इसलिए वह इस व्यवहार को रोक नहीं सकता। यानी, यह दुरभिसंधि चलती रहेगी और मेडिक्लेम वालों से डॉक्टर व अस्पताल ज्यादा पैसा वसूलते रहेंगे।

वैसे, अस्पताल से साबका पड़नेवाले 99 फीसदी लोग इस सच्चाई से वाकिफ होंगे। शायद यहीं धांधागर्दी है जिसने स्वास्थ्य बीमा व्यवसाय के प्रति विश्वास का संकट पैदा कर रखा है। आईसीआईसी लोम्बार्ड के एक अध्ययन के मुताबिक देश में हर साल इलाज पर 2.50 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं, जिसका दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा लोग खुद वहन करते हैं। बीमा कंपनियां इसमें से महज 6000 करोड़ रुपए का क्लेम देती हैं।

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