पूंजी का गृहस्थ दर्शन

संजय तिवारी

आर्थिक मसलों पर काम करते समय भारत में मुख्य रूप से दो तरह की मानसिकता काम करती है। एक, वणिक मानसिकता और दूसरी किसान मानसिकता। उधार, लेन-देन और पूंजी से पूंजी का खेल वणिक मानसिकता है। लेकिन यह भी कोई स्वच्छंद व्यवस्था नहीं होती। इसका बाजार से ज्यादा सामाजिक सरोकारों से लेना-देना होता है। जिस भारतीय बैंकिग प्रणाली को आज हमारे वित्तीय प्रबंधक एक मजबूत व्यवस्था घोषित कर रहे हैं उसके मूल में यही सोच है। जिस दूसरी किसान मानसिकता की बात मैं कह रहा हूं उसे उपभोक्ता और उत्पादक का सम्मिलित रूप मानना चाहिए. बिग बाजार के संस्थापक किशोर बियानी ने करीब साल भर पहले कहा था कि वे ऐसी रणनीति पर काम कर रहे हैं जिससे किसान से माल खरीदकर किसान को ही बेच दिया जाए। असल में देश में संगठित रिटेल को बढ़ावा देने का यह प्रचारित सूत्र भी रहा है।

किशोर बियानी उस वणिक मानसिकता को पुनः जिन्दा करना चाहते हैं जो भारतीय व्यापार की सोच में विद्यमान है। लेकिन यहां एक गड़बड़ है। किशोर बियानी जिस मॉडल पर काम कर रहे हैं उसमें मध्यस्थ की भूमिका में कोई वणिक समाज नहीं आता बल्कि एक कंपनी ही आती है। व्यापार और लाभ की पूंजी किसी एक कंपनी तक अगर सिमट जाती है तो अच्छी सोच की क्या दुर्दशा होती है यह अमेरिका में धड़ाधड़ गिरे वित्तीय संस्थानों को देखकर समझा जा सकता है। वित्त और पूंजी प्रबंधन यह व्यक्ति का अपना निजी काम है। सदियों से वह अपना यह काम बड़ी कुशलता से करता आया है। भारत में वित्त प्रबंधन का यह दर्शन गृहस्थ के रूप परिभाषित है। गृहस्थ का जीवन अपने आप में वित्तीय प्रबंधन का जीता-जागता उदाहरण है जिसमें बाजार के साथ समाज और लोक व्यवहार का सुंदर सामंजस्य दिखाई देता है। यह गृहस्थ पूंजी अर्जन और निवेश के अपनों तरीकों का बड़ी चतुराई से इस्तेमाल करता है।

इस पूंजी अर्जन और निवेश के गृहस्थ दर्शन में एक बात का सर्वथा निषेध होता है कि वह कर्ज लेकर काम नहीं करेगा। यह निषेध केवल गृहस्थ के लिए है। वणिक समाज के लिए कर्ज का कहीं से निषेध नहीं है। गृहस्थ उपभोक्ता है, यह सर्वज्ञात तथ्य है लेकिन असलियत में वह उपभोक्ता के साथ-साथ उत्पादक भी है। उसके इस उत्पादक और उपभोक्ता के बीच बाजार का ऐसा सामंजस्य होता है कि न उपभोक्ता अनियंत्रित होता है और न बाजार। व्यापक समाज पर इसका असर यह होता है कि बाजार में पूंजी का प्रवाह और वस्तुओं की मांग दोनों ही बनी रहती है। अगर उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को दो अलग इकाई के रूप में स्थापित कर दिया जाए तो बाजार डांवाडोल हो जाता है। कोई भी आर्थिक संरचना बनाते समय इस बात का ध्यान रखना होता है कि वह कितने लोगों को लाभ पहुंचा सकती है। यह तो बहुत निम्नस्तर की आर्थिक सोच है कि किसी संचरना से कोई कंपनी या व्यक्ति विशेष कितना फायदा उठा सकता है। दुर्भाग्य से आज भारत में जिसे नयी अर्थव्यवस्था कहा जा रहा है वह पूंजी की इसी घटिया प्लानिंग का हिस्सा है। यहां सर्वव्यापी समाज को उत्पादक बनाने की बजाय एकतरफा केवल उपभोक्ता समझा जाता है। अब अगर कोई उपभोक्ता उत्पादक नहीं होगा तो वह ज्यादा लंबे समय तक एक अच्छा उपभोक्ता भी नहीं रह पाएगा। पूंजी का केंद्रीकरण करनेवालों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उत्पादक का आधार अगर व्यापक नहीं होगा तो उपभोक्ता की सतत श्रृंखला को बनाकर रखना मुश्किल हो जाएगा। पूंजी के वर्तमान दर्शन में सबसे बड़ा खोट यही है कि इसने उत्पादन ही नहीं, वितरण को भी कुछ हाथों तक समेट दिया है। शेष समाज स्वस्थ उपभोक्ता रहेगा भी कैसे?

एक उदाहरण से इस बात को समझें। भारत में कारों का बड़ा बाजार स्थापित हो गया है। पूरी कार इंडस्ट्री कितने लोगों के हाथ में है? उत्पादन के स्तर पर कुछ सौ कंपनियों के कुछ हजार कर्मचारी पूरी इंडस्ट्री के लाभार्थी बने हुए हैं। उत्पादन के बाद कार उद्योग दो और प्रकार के रोजगार के अवसर पैदा करता है। एक, डीलर और खुदरा वितरक और दूसरा है, रखरखाव और पुरानी कारों से जुड़ा हुआ उद्योग। जब विदेशी कंपनियों ने भारतीय कार बाजार में कदम रखा तो उन्होंने धीरे-धीरे डीलर नेटवर्क को अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया। ब्राण्ड नाम से लेकर डीलर के व्यवसाय में हिस्सेदारी तक हर जगह अब तक चली आ रही मुक्त व्यवस्था को उन्होंने संगठित कर दिया। इस संगठित स्वरूप का असर यह हुआ कि डीलर के स्तर पर जो व्यापार और पूंजी का विस्तार होता था उसमें भी कार निर्माता कंपनी ने अपना दबदबा कायम कर लिया। इसके बाद बचा कार रखरखाव और पुरानी गाड़ियों की बिक्री। मारूति पहले ही इस व्यापार में उतर चुकी है। रखरखाव के क्षेत्र में भी बड़ी कंपनियां आ रही हैं और पुरानी कारों के बिक्री के क्षेत्र में भी। इसका असर यह होगा कि कार उद्योग के कारण जो रोजगार और सीमित मात्रा में ही सही दूसरे लोगों के लिए विकास का रास्ता खुलता, वह सिमटकर कुछ लोगों के बीच रह जाएगा।

एक बात और महत्वपूर्ण है। पूंजी के विकेंद्रीकरण के साथ साथ पूंजी के भारतीय दर्शन में सामाजिक निवेश बहुत ज्यादा है। यहां पूंजी केवल पूंजी के प्रति उत्पादन के लिए नहीं है। अगर पूंजी केवल पूंजी के प्रति उत्पादन और खर्च तक सीमित है तो वह शोषक हो जाती है। पूंजी का अंतिम लक्ष्य मनुष्य के लिए सुख के उपाय करना है। यह तभी संभव है जब पूंजी के सामाजिक सरोकार हों। अगर पूंजी सामाजिक सरोकारों से अलग सिर्फ अपने प्रति उत्पादन तक सिमटकर रह जाती है तो पूंजी अपनेआप में एक संकट हो जाती है। पूंजी के गृहस्थ दर्शन में भारतीय गृहस्थ पूंजी सामाजिक सरोकारों और परिवार में निवेश करता है और पूंजी निवेश के इस तरीके से पूंजी के अंतिम लक्ष्य मानवीय सुख को प्राप्त करता है। यह बहुत बड़ी भूल है कि सामाजिक पूंजी निवेश व्यर्थ का अनुत्पादक कार्य है। आप भारतीय समाज ही नहीं दुनिया के किसी भी परंपरागत समाज को देखेंगे तो वह इसी सामाजिक तरीके से पूंजी निवेश करता है। पूंजी निवेश का यह तरीका जिस प्रकार के उत्पादक वर्ग को पोषित करता है वह ग्लोबल नहीं बल्कि लोकल होता है। वह उसी समाज के ताने-बाने का हिस्सा होता है जहां से पूंजी अर्जित की जा रही है। इस प्रकार पूंजी का एक ऐसा वृत्त बनता है जो नीचे से ऊपर क्रमांश में यात्रा करता है। इस यात्रा में पूंजी का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर रह जाता है लेकिन उसका कुछ हिस्सा ऊपर भी जाता है। यह आदर्श व्यवस्था है। इससे पूंजी भले ही स्थानीय स्तर पर अर्जित और निवेश की जाती है लेकिन यह अपने सभी प्रकार के लक्ष्यों को प्राप्त करती है।

लेकिन आज भारत में ठीक इसके उलट धारा बहाई जा रही है। पूंजी नीचे सिर्फ शोषण करने के लिए आती है और अपना अभीष्ट पूरा करके चटपट ऊपर भाग जाती है। यहां उपभोक्ता उत्पादक नहीं रह गया है। पूंजी एक सोख्ते की तरह काम कर रही है जो नीचे की भी बची-खुची समृद्धि ऊपर निचोड़ ले जाती है। यह मॉडल ध्वस्त नहीं होगा तो इस मॉडल पर कोई भी इकोनामी लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती। इसकी संचरना में ही खोट है।

लेखक हिंदी के चर्चित समाचार पोर्टल विस्फोट  (विस्फोट डॉट कॉम)के संपादक हैं।

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