जगह खाली है सीईओ की

कंपनी में चेयरमैन से ज्यादा अहमियत सीईओ की होती है। उसी तरह जैसे देश में राष्ट्रपति से ज्यादा अहमियत प्रधानमंत्री की होती है। कंपनी का सीईओ जो चाहे कर सकता है, हालांकि उसे निदेशक बोर्ड की मंजूरी लेनी पड़ती है। हमारा प्रधानमंत्री भी चाहे जो फैसले कर सकता है, हालांकि उसे पार्टी के हाईकमान और मंत्री-परिषद को साथ लेकर चलना होता है। पर मुश्किल यह है कि हमारे यहां देश से लेकर कंपनियों तक में खानदारी सफाखाना ज्यादा चल रहा है। कंपनियों में अब तो तय हो गया है कि चेयरमैन परिवार का मुखिया हो सकता है, लेकिन सीईओ उससे अलग होगा। आईटीसी या एल एंड टी जैसी प्रोफेशनली संचालित कंपनियों में तो किसी परिवार का कोई दखल ही नहीं है। इनफोसिस जैसी कंपनियों में संभव ही नहीं है कि नारायण मूर्ति का बेटा या बेटी आगे कंपनी की बागडोर संभाले। विप्रो जैसी पारिवारिक कंपनी तक में जरूरी नहीं है कि अजीम प्रेमजी का बेटा कंपनी का अगला चेयरमैन बने।

लेकिन कंपनियों, सरकारों व संस्थानों-संस्थाओं के संगठित तंत्र से अलग हमारे देश का अवाम है जिसकी तादाद कुछ नहीं तो 75-80 करोड़ होगी और जिसका कोई सीईओ नहीं है। राजनीतिक पार्टियां हैं, उनका आलाकमान है, उनके मुखिया हैं। लेकिन अवाम के व्यापक हित से ज्यादा उनके लिए अपना राजनीतिक स्वार्थ मायने रखता है। पार्टियों को अपना बचा-खुचा साम्राज्य बचाने की चिंता है, न कि अवाम की। अवाम के मसले उन्हें तभी परेशान करते हैं जब कहीं शांति-भंग होती है। नहीं तो स्वार्थों का बांट-बखरा बदस्तूर चलता रहता है। बयानबाजियां तो विज्ञापन जैसी होती हैं। वीआईपी बनियान पहनने के कोई आगे नहीं जाता, पांड्स क्रीम लगाने से कोई गोरा नहीं होता या कोकाकोला खुशियों की बूंद लेकर नहीं आता और न ही कोक की बोतल खोलने से बात चलती है। सब छलावा है, लुभावना सलीका है, हमारे जेहन पर मारा गया जोर का पंच है। अपराधियों को बीएसपी से निकालने की बहन मायावती की ‘मुहिम’ को ऐसा एक ‘एड-कैम्पेन’ माना जाना चाहिए।

ऐसे में कभी-कभी मेरे जेहन में सवाल उठता है कि हमारे अवाम का सीईओ कौन है? कौन है जो दिल से उसका हितचिंतक है? कौन है जिसकी हर प्रतिबद्धता उसके प्रति है? वाम भी नहीं, दक्षिण भी नहीं। कॉरपोरेट क्षेत्र की सीएसआर भी नहीं, एनजीओ भी नहीं। नजदीक से देखने पर मेधा पाटेकर भी नहीं, अरुंधति रॉय भी नहीं। नक्सली भी नहीं, माओवादी भी नहीं। माओवादी तो राजनीति की जटिल हकीकत से भाग कर आदिवासियों में शेल्टर तलाशनेवाले दिमागी और विचारधारात्मक स्तर पर अवरुद्ध बुद्धिजीवी हैं। वे आदिवासियों के बीच भगवान बन जाते हैं क्योंकि आदिवासी आधुनिक सत्ता-समाज और उद्पादन पद्धतियों की जटिलता से वाकिफ नहीं हैं।

लेकिन देश में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना में उनका भी एक रोल है जिसे दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार निभाने नहीं दे रही है। माओवादी भगोड़े ही सही, लेकिन वे आदिवासी इलाकों में उन स्थानीय तत्वों से लड़ते हैं जिन्होंने अवाम की बोलती बंद कर रखी है। ये सामंती तत्व नेता भी हो सकते हैं, ठेकेदार और सरकारी अधिकारी भी। इनके परास्त होने से आदिवासी समुदाय को वन-संपदा पर वह अधिकार मिलेगा जिसे सरकार तमाम कानूनों के जरिए उन तक पहुंचाना चाहती है। केंद्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इन इलाकों में लोकतंत्र-विरोधी ताकतों को खत्म करने के लिए माओवादियों का इस्तेमाल करें। लेकिन इसके विपरीत इन इलाकों में स्थाई रूप से सीआरपीएफ के कैंप बैठा दिए जाते हैं। ये अर्द्ध-सैनिक बल लोकतंत्र-विरोधी ताकतों की हिफाजत में जुड़ जाते हैं तो माओवादियों व सामंती ताकतों के दो पाटों के बीच पिस जाते हैं।

हो सकता है मेरी सोच गलत हो। लेकिन हमारे ऑक्सफोर्ड रिटर्न गृह मंत्री पी चिदंबरम या उन लोगों की सोच तो एकदम गलत है जो आदिवासी इलाकों में सेना की तैनाती की वकालत करते हैं। हमारे थल सेनाध्यक्ष वी के सिंह इस मायने में काफी समझदार हैं जो पहले ही कह चुके हैं कि अगर हम अपने सैनिकों का इस्तेमाल अपने ही अवाम के खिलाफ करेंगे तो बाहरी दुश्मन से युद्ध होने पर देशवासियों का एक हिस्सा हमारे खिलाफ जा सकता है।

यह सारी बातें इसलिए कि मुझे बहुत शिद्दत से लगता है कि देश के व्यापक अवाम को सीईओ की जरूरत है। एक नहीं, अनेक। दसियों नहीं, सैकड़ों नहीं, हजारों सीईओ चाहिए जो अवाम के हितों से जुड़े हरेक मसले का विवेचन कर सकें और उसे हर स्तर पर शक्तिसंपन्न बनाने की मुहिम चला सकें। उन्हें पैसे कौन देगा? अरे, कंपनी के सीईओ को जब कंपनी पैसा देती है तो अवाम के सीईओ को क्या कोई बाहरी पैसा देगा!?! कई बार मेरे मन में ख्याल आता है कि मैं जोर से चिल्लाकर कहूं कि I am CEO of the Indian masses…. फिर अपने पागलपन पर हंसता हूं। क्या आप में से भी कुछ लोग हैं जिन पर पागलपन के ऐसे दौरे पड़ते हैं?

4 Comments

  1. ख़लील जिब्रान की एक कहानी पढ़ी थी, हिंदी में, किताब का नाम था बटोही। अंग्रेज़ी में यह है:
    [sceptre= दंड (डंडा)]
    “The King”

    The people of the kingdom of Sadik surrounded the palace of their king shouting in rebellion against him. And he came down the steps of the palace carrying his crown in one hand and his sceptre in the other. The majesty of his appearance silenced the multitude, and he stood before them and said, “My friends, who are no longer my subjects, here I yield my crown and sceptre unto you. I would be one of you. I am only one man, but as a man I would work together with you that our lot may be made better. There is no need for king. Let us go therefore to the fields and the vineyards and labour hand with hand. Only you must tell me to what field or vineyard I should go. All of you now are king.”

    And the people marvelled, and stillness was upon them, for the king whom they had deemed the source of their discontent now yielding his crown and sceptre to them and became as one of them.

    Then each and every one of them went his way, and the king walked with one man to a field.

    But the Kingdom of Sadik fared not better without a king, and the mist of discontent was still upon the land. The people cried out in the market places saying that they have a king to rule them. And the elders and the youths said as if with one voice, “We will have our king.”

    And they sought the king and found him toiling in the field, and they brought him to his seat, and yielded unto his crown and his sceptre. And they said, “Now rule us, with might and with justice.”

    And he said, “I will indeed rule you with might, and may the gods of the heaven and the earth help me that I may also rule with justice.”

    Now, there came to his presence men and women and spoke unto him of a baron who mistreated them, and to whom they were but serfs.

    And straightway the king brought the baron before him and said, “The life of one man is as weighty in the scales of God as the life of another. And because you know not how to weigh the lives of those who work in your fiends and your vineyards, you are banished, and you shall leave this kingdom forever.”

    The following day came another company to the king and spoke of the cruelty of a countess beyond the hills, and how she brought them down to misery. Instantly the countess was brought to court, and the king sentenced her also to banishment, saying, “Those who till our fields and care for our vineyards are nobler than we who eat the bread they prepare and drink the wine of their wine-press. And because you know not this, you shall leave this land and be afar from this kingdom.”

    Then came men and women who said that the bishop made them bring stones and hew the stones for the cathedral, yet he gave them naught, though they knew the bishop’s coffer was full of gold and silver while they themselves were empty with hunger.

    And the king called for the bishop, and when the bishop came the king spoke and said unto his, “That cross you wear upon your bosom should mean giving life unto life. But you have taken life from life and you have given none. Therefore you shall leave this kingdom never to return.”

    Thus each day for a full moon men and women came to the king to tell him of the burdens laid upon them. And each and every day a full moon some oppressor was exiled from the land.

    And the people of Sadik were amazed, and there was cheer in their heart.

    And upon a day the elders and the youths came and surrounded the tower of the king and called for him. And he came down holding his crown with one hand and his sceptre with the other.

    And he spoke unto and said, “Now, what would you do of me? Behold, I yield back to you that which you desired me to hold.”

    But they cried. “Nay, nay, you are our rightful king. You have made clean the land of vipers, and you have brought the wolves to naught, and we welcome to sing our thanksgiving unto you. The crown is yours in majesty and the sceptre is yours in glory.”

    Then the king said, “Not I, not I. You yourselves are king. When you deemed me weak and a misruler, you yourselves were weak and misruling. And now the land fares well because it is in your will. I am but a thought in the mind of you all, and I exist not save in your actions. There is no such person as governor. Only the governed exist to govern themselves.”

    And the king re-entered his tower with his crown and his sceptre. And the elders and the youths went their various ways and they were content.

    And each and every one thought of himself as king with a crown in one hand and a sceptre in the other.

    http://gutenberg.net.au/ebooks05/0500631h.html#13

  2. देश के प्रत्येक नागरिक को लिमिटेड कम्पनी की तरह (क्योंकि प्रत्येक मतदाता प्राकृतिक रूप से इस देश का शेयर होल्डर है) राष्ट्रीय आय में नकद भागीदारी (शेयर होल्डर को डिविडेण्ड की तरह) दिए जाने का प्रस्ताव संसद में रूल 168 के तहत विचाराधीन है। इस याचिका पर चौदहवीं लोकसभा में 134 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे व राज्यसभा में 25 सांसदों ने हस्ताक्षरित किया है।
    अट्ठन्नी से रिश्ता जुड़ जाए चाहे पर आय में नकद भागीदारी का रिश्ता जिस दिन देश के नागरिक का अपने देश से जुड जाएगा उस दिन दुनिया का सर्वश्रेष्ठ सी ई ओ आप संसद में पाएंगे।
    हमने यह याचिका संसद में पेश करने में पाँच वर्ष खपाए हैं, इस बोए बीज का फल देखना अनिल रघुराज जी। इंफोसिस के एक निदेशक (इनका नाम मैं भूल रहा हूँ) ने इस विचार की वकालत करते हुए कहा है कि समाज की कोई ऐसे समस्या नही है जिसका इस विचार से समाधान न होता हो। इलेक्ट्रोनिक एज में प्रत्येक नागरिक को आय का नकद हिस्सा दिया जा सकना सम्भव है व इसके अलावा भाविष्य में जीवित रहने का कोई उपाय नही है। http://fefm.org/download/pdf/FAQ%20on%20Petition%20in%20Indian%20Parliament%20for%20votership%20and%20GAPP.pdf

  3. CEO jesa kaary pratek Ganw yevam shahar mai sarvshresth vyakti ke rup mai municiplity ke chairman ya panchayat ke pradhan ke alawa waha ke vashindo ki rajamandi mai sushobhit kiya ja sakta h .waha rahne wale har vyakti ka sambhandh us shresth vyakti ke mobile ke SMS se hoga. unka yekmatra kaary sms se aai vashindo ki samasya ko samjhna aur aage tak vividh sambhandhit kaarylay tak pahunchana h . sabhi tarah ki sahayta uplabdh karwana h jisse ve khushihali se jiwan yapan kar sake . Ab rahi ceo jese dhanrashi ki ~~~ sabhi ka apna swechha se diya huwa jis tarah apan mandiro mai kiya karte h kar sakte h . kyuki VE , hum sab kis tarah day to day mai hone wali samsya se chhutkara ho praypt salah unse pa sakte h. jesa ki ve purn nispakch vyakti hoge hriday se bhi . unka yekmatra kaarya SEVA hi h . kahi mai soch mai galat to nahi hu ???!!!

  4. देश के प्रत्येक नागरिक को लिमिटेड कम्पनी की तरह (क्योंकि प्रत्येक मतदाता प्राकृतिक रूप से इस देश का शेयर होल्डर है) राष्ट्रीय आय में नकद भागीदारी (शेयर होल्डर को डिविडेण्ड की तरह) दिए जाने का प्रस्ताव संसद में रूल 168 के तहत विचाराधीन है। इस याचिका पर चौदहवीं लोकसभा में 134 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे व राज्यसभा में 25 सांसदों ने हस्ताक्षरित किया है।
    अट्ठन्नी से रिश्ता जुड़ जाए चाहे पर आय में नकद भागीदारी का रिश्ता जिस दिन देश के नागरिक का अपने देश से जुड जाएगा उस दिन दुनिया का सर्वश्रेष्ठ सी ई ओ आप संसद में पाएंगे।
    हमने यह याचिका संसद में पेश करने में पाँच वर्ष खपाए हैं, इस बोए बीज का फल देखना अनिल रघुराज जी। इंफोसिस के एक निदेशक (इनका नाम मैं भूल रहा हूँ) ने इस विचार की वकालत करते हुए कहा है कि समाज की कोई ऐसे समस्या नही है जिसका इस विचार से समाधान न होता हो। इलेक्ट्रोनिक एज में प्रत्येक नागरिक को आय का नकद हिस्सा दिया जा सकना सम्भव है व इसके अलावा भाविष्य में जीवित रहने का कोई उपाय नही है।
    http://fefm.org/download/pdf/FAQ%20on%20Petition%20in%20Indian%20Parliament%20for%20votership%20and%20GAPP.pdf

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