ओपन ऑफर की सीमा 25% हो सकती है

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी कंपनियों के अधिग्रहण के लिए ओपन ऑफर की सीमा को न्यूनतम 20 फीसदी के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 25 फीसदी कर सकती है। वह यह फैसला पिछले साल बनाई गई टेकओवर रेगुलेशंस एडवाइजरी कमिटी (टीआरएसी) की सिफारिशों के आधार पर करेगी। साथ ही यह भी संभव है कि ओपन ऑफर लाने की ट्रिगर लिमिट 15 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी कर दी जाए। सूत्रों के मुताबिक सेबी जल्दी ही अपने टेकओवर कोड या अधिग्रहण संहिता में इन बदलावों की घोषणा कर सकती है।

बता दें कि अधिग्रहण के नियमों को लेकर काफी कानूनी उलझने हैं। सेबी ने यह कमिटी बनाते वक्त कहा था कि टेकओवर रेगुलेशन 1997 के हैं। उसके बाद टेकओवर के बारे में सुप्रीम कोर्ट से लेकर कई-कई हाई कोर्ट और विशेष अपीलीय ट्राइब्यूनल (एसएटी) तक के अहम फैसले आ चुके हैं। खुद सेबी ने भी नई-नई व्याख्याएं पेश की हैं। ऐसे में इन नियमों को दुरुस्त और अद्यतन करना जरूरी हो गया है।

अभी इसी 13 मई को टेकओवर से जुड़े एक मामले में सेबी को एसएटी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाना पड़ा है। एसएटी ने जनवरी में दिए गए सेबी के एक आदेश को ठुकराते हुए कहा था कि प्राइवेट इक्विटी या वेंचर कैपिटल फंड अगर किसी कंपनी में 15 फीसदी इक्विटी हासिल कर लेते हैं, तब भी उन पर 20 फीसदी और शेयर खरीदने का ओपन ऑफर लाने की बाध्यता नहीं होनी चाहिए। लेकिन सेबी को लगता है कि यह गलत है। इस पर सुप्रीम कोर्ट तीन सदस्यीय बेंच ने एसएटी और सेबी, दोनों से लिखित विवरण मांगा है। इस बेंच के अध्यक्ष नए मुख्य न्यायाधीश एस एच कापडिया हैं और जस्टिस के एस राधाकृष्णन व स्वतंत्र कुमार इसके सदस्य हैं।

सेबी नए टेकओवर रेगुलेशन जारी कर इस तरह की कानूनी उलझनों को जल्द से जल्द खत्म कर देना चाहती है। सूत्रों के मुताबिक टीआरएसी ने तो यहां तक कहा है कि 20 फीसदी के ओपन ऑफर को 100 फीसदी कर दिया जाना चाहिए क्योंकि पहले 15 फीसदी और फिर 20 फीसदी शेयर हासिल कर कोई नया मालिक 35 फीसदी हिस्सेदारी के साथ कंपनी पर अधिकार जमा देता है तो उससे सभी पुराने शेयरधारकों को बाहर निकलने का मौका मिलना चाहिए। लेकिन सेबी फिलहाल इसे कम से कम 25 फीसदी करने पर सहमत हो गई है।

जहां तक शुरुआती ट्रिगर लिमिट की बात है तो अभी कोई निवेशक अगर किसी सूचीबद्ध कंपनी के 15 फीसदी शेयर खरीद लेता है तो उस पर सेबी के टेकओवर रगुलेशन लागू हो जाते हैं और उसे कंपनी के  कम के कम 20 फीसदी और शेयर आम शेयरधारकों से खरीदने के लिए ओपन ऑफर लाना पड़ता है। टीआरएसी के एक सदस्य ने अपना नाम न जाहिर करते हुए बताया कि 15 फीसदी की ट्रिगर लिमिट 1998 में बनाई गई थी। उसके बाद 11 सालों में जमीनी हकीकत बहुत बदल चुकी है। इसलिए इसे बढ़ाकर 25 फीसदी करने की सिफारिश की गई है।

बता दें कि सेबी ने 4 सितंबर 2009 को  अपने अधिग्रहण संबंधी नियमों की समीक्षा के लिए 12 सदस्यीय समिति (टीआरएसी) बनाई थी। इसके प्रमुख सिक्यूरिटीज अपीलेट ट्राइब्यूनल (एसएटी) के पूर्व पीठासीन अधिकारी सी. अच्युतन हैं। समिति के सदस्यों में टाटा स्टील के सीएफओ कौशिक चटर्जी, लार्सन एंड टुब्रो के सीएफओ वाई.एम. देवस्थली, कोटक महिंद्रा के कार्यकारी निदेशक सौरव मलिक और डीएसपी मेरिल लिंच के प्रबंध निदेशक राज बालाकृष्णन जैसे कॉरपोरट जगत के लोग हैं। इसमें सेबी की तरफ से दो कार्यकारी निदेशक ऊषा नारायणन व जे. रंगनायाकुलु और एक महाप्रबंधक नीलम भारद्वाज शामिल हैं। यह समिति सभी पक्षों से विचार-विमर्श के बाद अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे चुकी है।

नए सुझावों के लिए 31 अक्टूबर 2009 तक पब्लिक से भी प्रतिक्रिया मांगी गई थी। इसमें से अधिकांश प्रतिक्रियाएं कंपनियों, मर्चेट बैंकरों या पूंजी बाजार से जुड़े कारोबारियों व कॉरपोरट लॉ फर्मो की तरफ से आई हैं। पब्लिक के नाम पर गिनी-चुनी निवेशक संस्थाओं ने मेल भेजे हैं। समिति के सदस्य ने बताया कि शुरुआत में लिस्टिंग एग्रीमेंट के अनुच्छेद 40-ए और बी में अधिग्रहण शर्तो के लागू होने की सीमा 25 फीसदी ही थी। फिर इसे 10 फीसदी किया गया। 1995 में बनी जस्टिस भगवती समिति ने भी इसे 10 फीसदी ही रखने की सलाह दी। लेकिन 1998 में इसे 15 फीसदी कर दिया गया। विभिन्न देशों में यह सीमा अलग-अलग है। इंगलैंड में यह 30 फीसदी, सिंगापुर में 25 फीसदी और हांगकांग में 35 फीसदी है। हालांकि अमेरिका में यह केवल पांच फीसदी है। इसलिए भारत को भी यह सीमा अपने बाजार की हकीकत को ध्यान में रखते हुए तय करनी पड़ेगी।

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