आंध्र सरकार का भी हाथ था सत्यम घोटाले में

सत्यम कंप्यूटर्स के बदनाम घोटाले में आंध्र प्रदेश सरकार की भी भूमिका रही है। यह बात भारतीय महालेखाकार (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट राज्य विधानसभा में पेश की जा चुकी है। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि राज्य सरकार ने कंपनी को विशाखापटनम के नजदीक 42.5 एकड़ जमीन महज 10 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से दी थी। जहां इस जमीन की कीमत 170 करोड़ रुपए बनती है, वहीं सरकार ने इसे मात्र 4.25 करोड़ रुपए में सत्यम कंप्यूटर्स को आवंटित कर दिया।

सीएजी ने राज्य सरकार को लताड़ पिलाते हुए कहा है कि इससे एक तो समान अवसर के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होता है, दूसरे उसने इस मामले में पारदर्शिता भी नहीं बरती है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार ने कंपनी को उस सीमा से ज्यादा जमीन आवंटित की है जो उसकी इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी एंड कम्युनिकेशन नीति में बांधी गई है।

यही नहीं, राज्य सरकार ने सत्यम के प्रवर्तक रामलिंगा राजू से जुड़ी कंपनी मेटास के कंसोर्टियम को मछिलीपटनम बंदरगाह के विकास से जुड़ा ठेका दे दिया जिससे सरकार पर 335 करोड़ रुपए का बोझ बढ़ गया। पहले यह बंदरगाह गोगिलेरु में बनाया जाना था, लेकिन बाद में इसकी जगह बदलकर गिलाकलाडिन्ने कर दी गई।

सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि आंध्र सरकार दोनों ही जगहों पर वित्तीय बोलियों पर जोर देने में नाकाम रही। मेटास के कंसोर्टियम ने राज्य सरकार से 335 करोड़ रुपए ज्यादा झटक लिए, जबकि शुरुआती योजना यह थी कि बंदरगाह को आमदनी में हिस्सेदारी के आधार पर विकसित किया जाएगा और इसमें सरकार कुछ भी निवेश नहीं करेगी। इस कंसोर्टियम ने गिलाकलाडिन्ने के लिए शुरुआत में कोई बोली नहीं लगाई थी। इसके बावजूद उसे इसका काम दे दिया गया।

बता दें कि सत्यम के प्रवर्तक रामलिंगा राजू ने राज्य के तमाम नेताओं को साध रखा था और राजू के बड़े करीबी रिश्ते कांग्रेस से लेकर तेलुगू देशम पार्टी में रहे हैं। एक बात और। राजू का दिमाग फ्रॉड में जितना चलता था, उतना और कामों में नहीं। इसका एक छोटा सा उदाहरण है कि वह अपने बेटों की इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी के लिए कोई नाम ही नहीं सोच सका तो Satyam को उल्टी तरफ से लिखकर Maytas कर दिया।

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