जो लोग सच को सूत्रों में फिट करते हैं, वर्तमान को पूरी जटिलता के साथ समझे बगैर ही बदलने की बात करते हैं, वे कोरे लफ्फाज़ हैं, क्रांतिकारी नहीं। वे समाज की चक्रवाती भंवर से निकले झाग हैं। उनसे किसी सार्थक काम की उम्मीद बेमानी है।और भीऔर भी

इतना सारा जानकर करेंगे क्या? अगले जन्म में तो फिर सिफर से शुरू करना है! मृत्यु के इस भाव और भय से जिएंगे तो सारा ज्ञान निरर्थक लगेगा। लेकिन जीवन के हर पल को डूबकर जीना है तो ज्ञान का हर क़तरा जीने को सघन बना देगा।और भीऔर भी

जब किसी सेवा या उद्योग का मूल मकसद मुनाफे को महत्तम करना हो जाए तो उससे इंसानी सरोकारों के कद्र की उम्मीद बेमानी है। मुनाफे की यह दौड़ भिखारी तक की जेब से दमड़ी निकाल लेती है तो बाकियों का लुटना एकदम स्वाभाविक है।और भीऔर भी

कुछ भी पूर्ण नहीं। कुछ भी अंतिम नहीं। इसलिए पुराने आग्रहों से चिपके रहने का कोई फायदा नहीं। नए को लपाक से पकड़ लें। पुराना उसमें सुधरकर समाहित हो जाएगा। पुराने को पकड़े रहे तो नया भरे हुए प्याले से बाहर ही छलकता रहेगा।और भीऔर भी

किसी ने कुछ कह दिया। हम बिदक गए। यूं ही प्रतिक्रिया में जीते-जीते सारी जिंदगी कट जाती है। कभी ठहरकर यह तो सोचो कि तुम्हें खुद क्या पाना है, तुम्हारी मंज़िल क्या है? फिर ये सारा फालतू उछलना-कूदना थम जाएगा।और भीऔर भी

अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी

विचार किसी लता की तरह हैं जिन्हें अगर बाहर का कोई सहारा न मिले तो उनका बढ़ना रुक जाता है। इसलिए विचारों को बराबर व्यवहार के धरातल पर कसते रहना चाहिए। नहीं तो बे-काम हो जाते हैं।और भीऔर भी

कमजोर, कायर, काहिल, नाकारा, हवाबाज़ कहलाना किसको अच्छा लगता है। गालियों जैसी चोट करते हैं ये शब्द। लेकिन अगर कोई कह रहा है तो कुछ तो होगा। थोड़ा ठहरकर सोचने में क्या हर्ज है?और भीऔर भी

इतने कम में काम कैसे चला लेते हो भाई! जरूरतें बढ़ाओ और उनको पूरा करने का पुरुषार्थ करो। नहीं तो जिंदगी यूं ही अकारथ चली जाएगी और आप जहां से चले थे, वहीं तक सिकुड़े रह जाएंगे।और भीऔर भी