पार्टी, परिवार या संगठन में एक के पीछे जीरो लगाने से कुछ नहीं होता। एक और एक मिलकर ग्यारह भी नहीं बनता। हर किसी को अपने दांते घिसने पड़ते हैं। तब जाकर वह मशीन में फिट बैठता है।और भीऔर भी

हमारे देश के अधिकांश लोगों की तरह ही हैं दयाकृष्ण जोशी। किस्मत में भरोसा करते हैं। कहते हैं – अरे यार, भविष्य की क्या चिंता करना? जो होगा देखा जाएगा। एक आईटी कंपनी में कार्यरत जोशी का सोचना सही भी है। भारी वेतन। सुखी परिवार। स्नेहिल बीवी, दो प्यारे-प्यारे बच्चे – 8 साल की लडक़ी व 6 साल का लडक़ा। बच्चों के भविष्य हेतु: लेकिन पिछले साल एक हादसे में अपने 30 साल के एक रिश्तेदार कीऔरऔर भी

कोई भी घर-परिवार, देश या समाज अपना रह गया है या नहीं, इसकी एक ही कसौटी है कि वहां आप भय-मुक्त और निश्चिंत रहते हैं कि नहीं। जो आक्रांत करता है, वह अपना कैसे हो सकता है? वह तो बेगाना ही हुआ न!और भीऔर भी