निफ्टी सुबह के सत्र में 200 दिनों के मूविंग औसत (डीएमए) को पार नहीं कर पाया तो अधिकांश ट्रेडर शॉर्ट हो गए। लेकिन दो बजते-बजते बाजार ने कल जैसी चाल दिखानी शुरू कर दी और बहुत तेजी से कल के उच्च स्तर को मात देता हुआ 5244.60 तक बढ़ गया। आखिर में 0.70 फीसदी की बढ़त से साथ 5235.70 पर बंद हुआ है। इस बढ़त में ट्रेडरों के रुख बदलने का भी योगदान रहा क्योंकि ढाई बजेऔरऔर भी

ट्रेडर कल छूटते ही शॉर्ट हो गए थे क्योंकि निफ्टी 200 दिनों के मूविंग औसत (डीएमए), 5201.15 को पार करने में नाकाम रहा। कल ही साफ हो चला था कि आज बाजार का गलत रुख दिखाया जाएगा ताकि टेक्निकल एनालिसिस व चार्टों के भरोसे शॉर्ट हो गए ट्रेडरों व निवेशकों को कसा जा सके। हम यह अंदेशा भांपकर हम कल ही निफ्टी समेत जहां कहीं भी मुनाफा दिख रहा था, शॉर्ट कॉल्स से बाहर निकल गए औरऔरऔर भी

दुनिया के बाजारों के बढ़ने कारण अपना शेयर बाजार भी भारी अंतर के साथ खुला। निफ्टी 2.79 फीसदी बढ़कर 4883.65 पर तो सेंसेक्स 2.72 फीसदी बढ़कर 16,222.49 पर। शाम होते-होते निफ्टी 136.75 अंकों की बढ़त के साथ 4888.05 और सेंसेक्स 440.13 अंकों की बढ़त के साथ 16,232.54 पर बंद हुआ। इस बीच खाद्य मुद्रास्फीति के ताजा आंकड़ों से जाहिर हुआ कि इस पर कोई लगाम नहीं लग पा रही है तो दोपहर बाद थोड़ी मुनाफावसूली देखी गई।औरऔर भी

हर कोई आश्चर्य कर रहा है कि कैसे बाजार इतना बढ़ गया। निफ्टी 2.15 फीसदी बढ़कर 5140.20 और सेंसेक्स 2.11 फीसदी बढ़कर 17,099.28 पर जा पहुंचा। लेकिन इसमें हमारे लिए कोई चौंकने की बात नहीं थी क्योंकि हमें पता था कि भारतीय बाजार एकदम तलहटी पर पहुंच चुके हैं। ग्रीस को 76.9 करोड़ यूरो का अपना वाजिब हिस्सा मिल गया और यूरोप के बाजार 2 से 3 फीसदी बढ़ गए। ऐसे में स्वाभाविक था कि शॉर्ट केऔरऔर भी

अमेरिकी बाजार कल गिरे तो सही, लेकिन आखिरी 90 मिनट की ट्रेडिंग में फिर सुधर गए। अमेरिकी बाजार में ट्रेड करनेवाले कुछ फंडों का कहना है कि इस गिरावट की वजह यूरो संकट थी, न कि यह शिकायत कि 447 अरब डॉलर का पैकेज रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करने के लिए काफी नहीं है। यह पैकेज तो अभी तक महज घोषणा है और इसका असर वास्तविक खर्च के बाद ही महसूस किया जा सकता है। इसऔरऔर भी

अमेरिका और यूरोप से बराबर कमजोरी की खबरें आती रहीं। भारतीय बाजार नीचे और नीचे होता रहा। दुनिया के बाजारों में गिरावट से भारतीय बाजार में घबराहट बढ़ती गई। शुक्र है कि रिटेल निवेशक अभी तक बाजार से बाहर हैं, इसलिए इस बार भुगतान का कोई संकट नहीं खड़ा हुआ। इस मायने में 2011 का सदमा 2008 के सदमे से भिन्न है। 2008 में बाजार यकीनन ओवरबॉट स्थिति में था, वह भी बड़े पैमाने पर मार्जिन याऔरऔर भी