लालच चुनौतियों का
कितना अजीब है! संगठन या संस्था में लोगों को लालच देकर रोकना मुश्किल है। पर उनके सामने चुनौतियां पेश कर दो तो वे बड़ी आसानी से रुक जाते हैं। उनके निजी विकास की संभावनाओं के द्वार खोल दो, वे कहीं और जाने का नाम ही नहीं लेंगे।और भीऔर भी
सोचना देश के लिए
देश के लिए सोचना आसान है, करना कठिन। सोचने के लिए बस भावना चाहिए, जबकि करने के लिए सही हालात का सच्चा ज्ञान जरूरी है। भावना में सच्चे, ज्ञान में कच्चे रहे तो सत्ता के लिए लार टपकाता कोई समूह हमारा इस्तेमाल कर लेता है।और भीऔर भी
अपना ही नुकसान
सोते हुए को जगाना आसान है, जगते हुए को जगाना मुश्किल। लेकिन जो लोग जागते हुए भी सोते रहते हैं, वे किसी और का नहीं, अपना ही नुकसान करते हैं। असहज अवस्था में होने के कारण फालतू चीजें भी उनके लिए घातक बन जाती हैं।और भीऔर भी
सब कसौटी पर
खेमे पकड़ लेना सबसे आसान है। लेकिन खेमों से बाहर निकलकर सत्य का अनुसंधान बहुत कठिन है। खेमों में आस्था चलती है। आप बहुत कुछ मानकर चलते हैं। लेकिन यहां सब कुछ कसौटी पर कसा जाता है।और भीऔर भी
बहुमत पर अल्पमत
लोकतंत्र में फैसले लेना बड़ा आसान है क्योंकि बहुमत की राय आसानी से जानी जा सकती है। फैसलों में मुश्किल तब आती है कि कोई सरकार बहुमत के नाम पर अल्पमत का हित सब पर थोपना चाहती है।और भीऔर भी
परत-दर-परत
बड़ा आसान है निष्कर्षों में सच को फिट करके संतुष्ट हो जाना। लेकिन सच से निष्कर्षों को निकालना उतना ही मुश्किल है क्योंकि अपने करीब पहुंचते ही सच खटाक से नई-नई परतें खोलने लग जाता है।और भीऔर भी
मुड़ना आदतों का
आदतों को मोड़ना बड़ा कठिन है, लेकिन बेहद आसान भी। ऊपर से ठोंक-ठोंककर मनाएंगे, आदत जाने का नाम नहीं लेगी। लेकिन अंदर से ज़रा-सा इशारा करेंगे तो टनों का पूरा इंजिन मुड़ता चला जाएगा।और भीऔर भी
द्रोही कौन?
ज़िदगी तो हम अकेले ही जीते हैं। परिवार इसे आसान व रागात्मक बना देता है। समाज इसे लय व ताल से भर देता है। देश इसे सुरक्षित व उदात्त बना देता है। आखिर कौन हैं वे जो देश को ऐसा बनने नहीं दे रहे?और भीऔर भी
ब्रह्मा की सीमा
किसी मूर्ख को आसानी से खुश किया जा सकता है। बुद्धिमान को खुश करना और भी आसान है। लेकिन अपने ‘ज्ञान’ पर मुग्ध लोगों को ब्रह्मा भी खुश नहीं कर सकते। इसलिए इनके मुंह नहीं लगना चाहिए।और भीऔर भी

