कंपनियां भी इंसान ही चलाते हैं, कोई भगवान नहीं। हर कंपनी के पीछे प्रवर्तक और उनका बनाया प्रबंधन होता है। हमें उसी कंपनी में पूंजी लगानी चाहिए जिसका कामकाज पारदर्शी हो, प्रबंधन ईमानदार हो और उसे पूंजी का सही नियोजन आता हो। जिस कंपनी के प्रवर्तकों ने अपने शेयरों का कुछ हिस्सा गिरवी रख रखा हो, उससे दूर रहना चाहिए क्योंकि गिरते बाज़ार की भंवर इन्हें डुबा देती है। इस हफ्ते बायोफार्मा सेगमेंट की सबसे दबंग कंपनी…औरऔर भी

ल्यूपिन लिमिटेड नाम से कुछ भी लगे। लेकिन है यह खांटी देसी कंपनी। केमिस्ट्री में एमएससी करनेवाले देशबंधु गुप्ता ने 1968 में इसकी स्थापना की। बताते हैं कि गुप्ता जी शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय पेटेंट के जमाने में जाली दवाएं बनाकर बेचते थे। लेकिन 1970 में भारतीय पेटेंट एक्ट आ गया। फिर गुप्ता जी को वाल्मीकि के अंदाज में समझ में आ गया है कि गलत धंधा करने में फायदा नहीं और वे कुशल सारथी व उद्यमी कीऔरऔर भी

डायबिटीज के मरीजों की संख्या में तीव्र वृद्धि के बीच दुनिया भर की कंपनियां इसके इलाज और इसकी रोकथाम के लिए नई दवाओं के विकास पर जोर दे रही हैं। दो साल के भीतर नई विकसित की जा रही दवाओं की संख्या करीब ढाई गुना हो गई है। अमेरिका की अग्रणी दवा अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों के संघ, फार्मास्यूटिकल रिसर्च एंड मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन (पीएचआरएमए) के मुताबिक 2010 में उसकी सदस्य कंपनियों द्वारा डायबिटीज या मधुमेह कीऔरऔर भी

एनपीपीए (नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी) ने घरेलू कंपनियों को राहत देने के मकसद से 62 दवाओं के दाम बढ़ा दिए हैं। जिन दवाओं के दाम बढ़ाए गए हैं, उनमें ज्यादातर देश में निर्मित इंसुलिन हैं। साथ ही एनपीपीए ने पिछले सप्ताह हुई समीक्षा बैठक में 14 दवाओं के दाम घटाए दिए हैं, जबकि 21 दवाओं की कीमत जस की तस रखी गई है। जिन दवाओं के दाम बढ़ाए गए हैं, उनमें से ज्यादातर का उपयोग डायबिटीज औरऔरऔर भी

केंद्र सरकार ने इस साल फरवरी में ही ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) की सलाह पर छह विशेषज्ञों की एक कमिटी बना दी थी जिसे तय करना था कि भारत में डायबिटीज की दवा रोज़िग्लाइटाज़ोन की बिक्री व इस्तेमाल पर कैसे बैन लगाया जाए। तब तक अमेरिका का खाद्य व औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए) ढिढोरा पीट चुका था कि इस दवा के इस्तेमाल से मरीज को दिल की बीमारी हो सकती है और वह मर भी सकता है।औरऔर भी

देश में डायबिटीज के मरीजों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज फेडरेशन के मुताबिक भारत में 1995 में डायबिटीज के 1.90 करोड़ मरीज थे। 2007 में यह संख्या 4.09 करोड़ हुई और इस साल 2010 में 5.08 करोड़ हो जाने का अनुमान है। चेन्नई के एमवी हॉस्टिपल के ताजा अध्ययन के अनुसार डायबिटीज का हर मरीज साल भर में इसके इलाज पर 25,931 रुपए खर्च करता है यानी सभी मरीजों का सालाना खर्चऔरऔर भी