सृजन व संगीत की मधुर स्वर लहरियां शांत मन से ही निकलती हैं। झंझावात से बवंडर ही उठते हैं। चीख-चिल्लाहट के माहौल में सृजन नहीं हो सकता। इसे यह कहकर जायज नहीं ठहराया जा सकता कि विनाश सृजन की जमीन तैयार करता है।और भीऔर भी

काश! हम उतना ही पैदा करते, जितना वाकई आवश्यक है। लेकिन मुनाफा बढ़ाते जाने के इस दौर में अनावश्यक चीजें बनाई और ग्राहकों के गले उतारी जा रही हैं। इससे वो प्राकृतिक संपदा छीझती जा रही है जो फिर कभी वापस नहीं आएगी।और भीऔर भी