सर पर किसी का साया रहे तो जमकर उछल-कूद मचाई जा सकती है। मां-बाप के साये में बच्चा यूं ही बढ़ता है। लेकिन पौधे को छाया में रखते ही उसके सारे पत्ते धीरे-धीरे गिर जाते हैं और वो सूख जाता है।और भीऔर भी

लोगों में व्यक्तिगत जीवन बीमा पॉलिसियां लेने के बजाय सामूहिक बीमा पॉलिसियां लेने का रुझान बढ़ रहा है। यह सच झलकता है बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) द्वारा शुक्रवार को जारी किए गए ताजा आंकड़ों से। दिसंबर 2010 तक सभी 23 जीवन बीमा कंपनियों के कारोबार संबंधी आंकड़ों से पता चलता है कि दिसंबर 2009 से दिसंबर 2010 के बीच जहां सामूहिक बीमा स्कीमों में कवर किए गए लोगों की संख्या 27.93 फीसदी बढ़ गई है, वहींऔरऔर भी

शायद आप भी उचित हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी चुनने की मुश्किल से रू-ब-रू हुए होंगे। पिछले दिनों ऐसी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्लिनिकल रिसर्च प्रोफेशनल अनुपम मिश्र को। 25 साल के अनुपम ने जब हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने के लिए बाजार की पड़ताल की तो वे अकबका रह गए। क्या लूं और क्या छोड़ दूं? बेसिक कवर, मेडिक्लेम, जटिल सर्जिकल प्रोसीजर्स, क्रिटिकल इलनेस, कैशलेश व हॉस्पिटल कैश री-इम्बर्समेंट जैसे प्लान्स ने अनुपम को कन्फ्यूज कर दिया।औरऔर भी

मुंबई की एक बीपीओ कंपनी में कार्यरत 52 वर्षीय अंकुश सावंत के पास हालांकि अपने नियोक्ता की ग्रुप मेडीक्लेम पॉलिसी है। पिछले दिनों उन्हें लगा कि हेल्थकेयर के बढ़ती खर्च की वजह से आज के जमाने में परिवार के हर सदस्य के पास पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी होना चाहिए। लेकिन बीमा एजेंट ने जब उन्हें प्रीमियम बताया तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। सावंत कहते हैं कि अगर यह हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी मैं 30औरऔर भी