राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 में देश का जीडीपी कितना रह सकता है, इसका पहला अग्रिम अनुमान पेश कर दिया है। उसका कहना है कि मौजूदा मूल्य पर हमारी अर्थव्यवस्था का आकार पिछले साल के 203.40 लाख करोड़ रुपए से घटकर इस बार 194.82 करोड़ रुपए रह सकता है, जबकि बजट अनुमान 224.89 लाख करोड़ रुपए का था। यानी, पिछले साल से 8.58 लाख करोड़ रुपए और इस साल के बजट अनुमान सेऔरऔर भी

इंसान के हाथों में इतनी बरकत है कि वह मिट्टी को सोना और पत्थर को हीरा बना सकता है। यही नहीं, अरबों साल पहले वह बंदर से इंसान बनना ही तब शुरू हुआ, जब उसने औजार बनाए, उन्हें इस्तेमाल करने का हुनर विकसित किया और आपसी संवाद के लिए भाषा ईजाद की। आज भी उसे हुनर, औजार या साधन दे दिए जाएं और उसकी भाषा में उससे सही संवाद किया जाए, महज लफ्फाज़ी न की जाए तो वह सब कुछ हासिल कर सकता है जो उसे चाहिए। फिर गरीबी क्या चीज़ है! आखिर कौन गरीब रहना चाहता है? वैसे भी गरीबी नैसर्गिक नहीं, बल्कि समाज की देन है। इंसान को हुनर, अवसर, साधन व काम करने की आज़ादी मिले तो गरीबी किसी दिन इतिहासऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक और उसके गवर्नर शक्तिकांत दास ने अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कृषि क्षेत्र से बड़ी उम्मीद लगा रखी है। दास का कहना है, “कृषि व संबंधित गतिविधियां ग्रामीण मांग को आवेग देकर हमारी अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार का नेतृत्व कर सकती हैं।” सही बात है। नेतृत्व ज़रूर कर सकती हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था का पूरा उद्धार नहीं कर सकतीं क्योंकि हमारे जीडीपी में कृषि, वानिकी व मत्स्य पालन जैसी संबंधित गतिविधियो का योगदान घटते-घटते 14 प्रतिशतऔरऔर भी

जर्मन मूल की ग्लोबल ई-पेमेंट कंपनी वायरकार्ड ने बैंकिंग और इसके नजदीकी धंधों में अपने हाथ-पैर पूरी दुनिया में फैला रखे थे। फिर भी उसका कद ऐसा नहीं है कि इसी 25 जून को उसके दिवाला बोल देने से दुनिया के वित्तीय ढांचे पर 2008 जैसा खतरा मंडराने लगे। अलबत्ता, जिस तरह इस मामले में एक बड़ी ग्लोबल एकाउंटेंसी फर्म अर्न्स्ट एंड यंग की सांठ-गांठ सामने आई है, उसे देखते हुए तमाम छोटे-बड़े निवेशकों में डर समाऔरऔर भी

आज नगरों-महानगरों की चौहद्दियों से लेकर राज्यों की सीमाओं और गांवों के ब्लॉक व पाठशालाओं तक लाखों मजदूर अटके पड़े हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल व पंजाब तक से प्रवासी मजदूर अपने गांवों को कूच कर चुके हैं। जो नहीं निकल पाए हैं, वे माकूल मौके व साधन के इंतज़ार में हैं। उन्हें अपने मुलुक या वतन पहुंचने की बेचैनी है। एक बार गांव पहुंच गए तो शायद कोरोना का कहर खत्म होने के बाद भी वापस शहरों काऔरऔर भी

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की अधिकतर आबादी अभी या तो लॉकडाउन में है या काफी रोकटोक के साथ काम पर जा रही है। कोरोना वायरस का प्रकोप समाप्त करने की रणनीति यह नहीं है, यह बात सभी जानते हैं। इसका मकसद बीमारी के विस्फोट का दायरा घटाने और बचाव का ढांचा खड़ा करने के लिए समय हासिल करने तक सीमित है। फ्लू के वायरस की तरह यह गर्मी आने के साथ नरम पड़ जाएगा, यह समझऔरऔर भी