एक समय की अच्छी बातें आगे जाकर रूढ़ि बन जाती है। मूर्तिभंजक ही मूर्तिपूजक बन जाते हैं। इसलिए जिस तरह सांप अपनी केंचुल उतारता रहता है, उसी तरह हमें भी रूढ़ियों को फेंकते रहना चाहिए।और भीऔर भी

कोई भी विचारधारा हमेशा के लिए नहीं होती क्योंकि रूढ़ियां उसे घेरकर बेजान बना देती हैं। पानी का आकार लोटे में कैद हो जाता है। इसलिए विचारधारा के प्राणतत्व को बराबर परिमार्जित करते रहना पड़ता है।और भीऔर भी