कार्बन तो वही है। लेकिन उसके परमाणुओं का अलग क्रम उसे हीरा बना देता है और ग्रेफाइट या कोयला भी। इसी तरह मूल तत्व हम सभी के अंदर वही हैं। सही ढाल दें को हीरा बन जाएं, नहीं तो कोयला।और भीऔर भी

हमारा तारणहार, हमारा मुक्तिदाता कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर बैठा है। वह प्रकृति का वो जटिल समीकरण है, उसके तत्वों का वो विन्यास है जो हमसे पूछे बिना हमें चलाता-नचाता रहता है।और भीऔर भी