कर्ता बाहर का नहीं, अंदर का ही कोई जीव-अजीव है। संतुलन हासिल करने के क्रम में सचेत-अचेत कर्म ही हर घटना के कारक हैं। बाकी सब समझने की सुविधा के लिए हम जैसे इंसानों द्वारा गढ़े गए पुतले हैं।और भीऔर भी

जिसे हम देख-समझ नहीं पाते, उसे अज्ञात कह देते हैं। लेकिन समूची सृष्टि में कुछ भी अकारण नहीं है। हां, यह जरूर है कि हाथी अपनी पीठ नहीं देख सकता। उसी तरह हमारी भी निजी सीमाएं हैं।और भीऔर भी