सपनों की तरह हमारी अंतःप्रेरणा भी कहीं आसमान से नहीं टपकती। वह हमारे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से संचित अनुभवों से निकलती है। इसलिए कोई अदृश्य प्रभाव जान उसे हमेशा सही मानने का कोई तुक नहीं है।और भीऔर भी

आपके मानने या चाह लेने से कुछ नहीं होगा। हाय-तौबा मचाना निरर्थक है। पहले जो है, जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार कीजिए। अगली यात्रा वहीं से शुरू होगी। सीमाएं समझकर ही सीमाएं तोड़ी जाती हैं।और भीऔर भी

हर धर्म दावा करता है कि उसकी मान्यताएं वैज्ञानिक हैं। लेकिन धर्म स्थिर है जबकि विज्ञान अपनी ही स्थापनाओं को तोड़ता बढ़ता जा रहा है। सोचिए, किसी दिन विज्ञान ही धर्म बन गया तो!और भीऔर भी