विचार को व्यक्ति से बांध कर देखना सही नहीं। ये विचार न तेरे हैं, न मेरे हैं। हम तो बस निमित्त हैं। विचार हमारे अंदर से निकलने के बाद स्वतंत्र हो जाते हैं। वे हमारी बपौती नहीं रह जाते।और भीऔर भी