तर्क की हद तक वहीं खत्म हो जाती है, जहां तक चीजें रैखिक होती हैं। धरती को जब तक चिपटा माना जाता रहा, तब तक तर्क ही सर्वोपरि थे। लेकिन धरती के गोल होते ही तर्क का सारा पटरा हो गया।और भीऔर भी

चीजों को कायदे से देखने-समझने के लिए उनसे ऊपर उठना जरूरी है। मगर धरती पर रहते हुए उससे ऊपर कैसे उठें? संसार में रहते हुए उससे निर्लिप्त कैसे हों? वैसे ही जैसे दही को मथो और मक्खन ऊपर।और भीऔर भी

ज़िंदगी हमारी अपनी है। पर धरती हम साझा करते हैं। हवा-धूप साझा करते हैं। दुनिया साझा करते हैं। देश साझा करते हैं। प्रशासन व राजनीतिक तंत्र साझा करते हैं। जो साझा है, उसकी भी तो फिक्र जरूरी है।  और भीऔर भी