हर तरफ बुरा ही बुरा है। सब कुछ टेढा-मेढा है। यह सोच-सोच कर रोने का कोई अंत नहीं है। देखना और सोचना यह चाहिए कि जो बुरा है, वो वैसा क्यों है। यह सिरा पकड़ कर ही हम उसे अच्छा कर सकते हैं।और भीऔर भी