हम ज्यादातर अपनी निष्क्रियता और दूसरे के कर्मों का फल भोगते हैं। जिस दिन से हम सोच-समझकर कायदे से अपने कर्मों पर उतर आते हैं, उसी दिन से सफलता की हमारी यात्रा शुरू हो जाती है। ऊंच-नीच जरूर आती है, लेकिन मंजिल मिलकर रहती है।और भीऔर भी