प्राण मरने पर ही शरीर नहीं छोड़ता, बल्कि जीवित रहते हुए भी प्राण तत्व घटता रहता है। पस्तहिम्मती और आत्मबल के डूबने के रूप में सामने आता है यह। हां, इस दौरान मृत्यु के जबड़े से जीवन को खींच लेने का विकल्प हमारे सामने खुला रहता है।और भीऔर भी

भावुक किस्म के जीव हैं हम। सजीव क्या, निर्जीव चीजों तक से मोह पाल लेते हैं। साल-छह महीने भी साथ रह लिए तो छोड़ते वक्त गला भर आता है। पर दुनियादारी के लिए यह भावुकता भली नहीं।और भीऔर भी