सत्य की जीत अपने आप नहीं होती। इसके लिए थोड़े झूठ, थोड़े छल का सहारा लेना पड़ता है। इसके लिए ‘नरो व कुंजरो व’ पर शंख बजाना, रथ से नीचे उतरे कर्ण से छल करना और विभीषण से भेद लेना जरूरी होता है।और भीऔर भी

हम भावनाओं के भूखे हैं। सिर्फ लेना चाहते हैं, देना नहीं। ज्ञान में ठीक इससे उलट हैं। सिर्फ देना चाहते हैं लेना नहीं। काश! ज्ञान के मामले में हम शाश्वत भिक्षु बन जाते और भावनाओं के मामले में दानवीर कर्ण। आमीन!और भीऔर भी