यहां अपने ही इतने उलझाव हैं कि दूसरों के बारे में कैसे सोचें? इसी सोच में अपनी ही नाक देखते रह जाते हैं हम। नहीं समझ पाते कि दूसरों के बारे में सोचने-देखने से हमें ऐसा आईना मिलता है जहां हमारी नजर के तमाम धोखे मिट जाते हैं।और भीऔर भी

चीजें अपने-आप में बड़ी सरल होती हैं। नियमबद्ध तरीके से चलती हैं। बड़ी क्रमबद्धता होती है उनमें। लेकिन हमारी सोच और अहंकार के चलते वे उलझी हुई नज़र आती हैं। सही नज़रिया मिलते ही सारा उलझाव मिट जाता है।और भीऔर भी

जितना हम जानते जाते हैं, सुख का स्तर उतना ही उन्नत होता जाता है और दुख का दायरा उतना ही बढ़ता जाता है। उलझाव बढ़ने से दुख बढ़ता है और उन्हें सुलझाते जाओ तो सुख बढ़ता चला जाता है।और भीऔर भी