स्पीक एशिया अपनी जिस साप्ताहिक ई-पत्रिका सर्वेज टुडे के सब्सक्रिप्शन के नाम पर अपने पैनलिस्टों से साल के 11,000 और छह महीने के 6000 रुपए लेने का दावा करती है, वैसी उसकी कोई ई-पत्रिका है ही नहीं। फिर भी कंपनी यह दावा इसलिए करती है ताकि उसके फ्रेंचाइजी या एजेंटों को यहां जमा की गई रकम को सिंगापुर भेजने का वाजिब आधार मिल जाए। असल में ये एजेंट व फ्रेंचाइजी अभी तक खुद को सर्वेज टुडे काऔरऔर भी

स्पीक एशिया ने इतना झूम-झामकर विज्ञापन नहीं किए होते तो शायद उसके फ्रॉड पर किसी की नजर नहीं जाती क्योंकि हमारे यहां के कानून इतने लचर हैं कि लूटनेवाले आराम से पतली गली से निकलकर जाते हैं। खुद स्पीक एशिया के सीईओ मनोज कुमार का कहना है कि भारत में 4200 मल्टी लेवल मार्केटिंग (एमएलएम) कंपनियां सक्रिय हैं जिसकी खास वजह है यहां के कायदे-कानून का कमजोर होना। लचर कानूनों के कारण ही नब्बे के दशक मेंऔरऔर भी