शेयर बाजार से 574 कंपनियां लापता होने की कगार पर

आम निवेशकों से करोड़ों की रकम जुटाकर लापता हो चुकी 121 कंपनियों की सूची तो कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने बड़ी प्रमुखता से अपनी वेबसाइट पर पेश कर रखी है। इसमें बताया गया है कि कैसे कोलकाता की वेस्टर्न इंडिया इंडस्ट्रीज निवेशकों से 232.60 करोड़ जुटाकर लापता हो चुकी है। लेकिन इस बात पर न तो मंत्रालय और न ही पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी का कोई ध्यान है कि देश के दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों बीएसई और एनएसई में सूचीबद्ध 574 कंपनियां लापता होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) द्वारा सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराई गई सूचना के मुताबिक 29 अक्टूबर 2009 तक उसने सूचीबद्धता नियमों को पूरा न करने के कारण 1325 कंपनियों में ट्रेडिंग रोक रखी है। यह संख्या बीएसई में सूचीबद्ध कुल 4951 कंपनियों की 27 फीसदी बनती है। इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने भी सूचीबद्धता समझौते का पालन न करने के कारण अपने यहां सूचीबद्ध 1800 कंपनियों में से 125 यानी करीब सात फीसदी कंपनियों में ट्रेडिंग रोक रखी है। लेकिन इन दोनों ही स्टॉक एक्सचेंज में ट्रेडिंग से रोकी गई इन कंपनियों में 574 कंपनियों के बारे में नाम के अलावा कोई जानकारी नहीं मिलती। यह भी नहीं पता चलता कि इसमें आम निवेशकों की कितनी पूंजी लगी है।

लापता होने की कगार पर पहुंची इन 574 कंपनियों में से 536 बीएसई में और 38 एनएसई में हैं। इनमें से कुछ चुनिंदा नाम हैं – अंबुजा जिंक, ऑटोपाल इंडस्ट्रीज, भगवती कॉटन, सीआरबी शेयर कस्टोडियन, धार सीमेंट, एनके टेक्सोफूड, फाइन प्लास्ट, गरोडिया केमिकल्स, हितेश टेक्सटाइल्स, आइडियल होटल्स, इंडो फ्रेंच बायोटेक, जगदंबा फूड्स, केजे इंटरनेशनल, कुमार कोटेक्स, मानव फार्मा, माया एग्रो, मेस्को फार्मा, मोंटारी इंडस्ट्रीज, नागार्जुन फाइनेंस, नेक्सस सॉफ्टवेयर, पैन ऑटो, प्रियदर्शिनी फैक्स, राहुल डेयरी, संजीवनी एग्रो, डायमिया कैपिटल, करुणा केबल्स, पाल प्यूजो, राजिंदर पाइप्स और राजिंदर स्टील। हमें याद है कि इनमें से तमाम कंपनियों के पब्लिक इश्यू बहुत जोरशोर से लाए गए थे। सेबी में पंजीकृत एक निवेशक संस्था के अधिकारी ने अपनी पहचान न जाहिर करते हुए बताया कि इस बाबत जब तक एनएसई या बीएसई कोई पहल नहीं करते, तब सेबी कुछ नहीं कर सकती। अगर यह बात सेबी की नजर में लाई जाए तो इन कंपनियों को स्टॉक एक्सचेंजों से डीलिस्ट किया जा सकता है और नियमानुसार बाजार में 26 हफ्तों के औसत मूल्य के हिसाब से कंपनी के शेयरधारकों को पैसा अदा किया जा सकता है। लेकिन अभी तो सस्पेंड होने की स्थिति में निवेशक ऐसी कंपनियों से बाहर नहीं निकल सकते।

एनएसई और बीएसई में ट्रेडिंग रोकी गई जिन बाकी 876 कंपनियों का रिकॉर्ड मिलता है, उनमें से ज्यादातर के प्रवर्तक अपनी इक्विटी हिस्सेदारी काफी घटा चुके हैं। इनमें से 789 कंपनियां बीएसई और 87 कंपनियां एनएसई में हैं। इनके शेयरों के भाव और चुकता पूंजी के आधार पर गणना करें तो इनका कुल बाजार पूंजीकरण 61,517 करोड़ रुपए है, जिसमें से पब्लिक के हिस्से में 58,227 करोड़ रुपए और प्रवर्तकों के खाते में 3290 करोड़ रुपए यानी 5.35 फीसदी हिस्सा ही है। अगर जिन 574 कंपनियों का रिकॉर्ड नहीं है, उनके अनुमानित आंकड़े जोड़ दिए जाए तो कुल 1450 सस्पेडेड कंपनियों में आम निवेशकों के कम से कम 70,000 करोड़ रुपए फंसे हो सकते हैं।

ब्रोकिंग व शोध कंपनी सीएनआई रिसर्च के प्रमुख किशोर ओस्तवाल कहते हैं कि यह एक बेहद गंभीर मसला है। असल में स्टॉक एक्सचेजों से 1450 कंपनियों को 1996 से अक्टूबर 2009 के दौरान सस्पेंड किया गया है। उनका कहना है कि सेबी या कॉरपोरेट मामलात मंत्रालय को निवेशकों को इन कंपनियों से निकलने का मौका देना चाहिए। वे इन्हें वेनिशिंग या लापता कंपनी घोषित कर सकते हैं। इसके बाद इन्हें स्टॉक एक्सचेंजों से डीलिस्ट किया जा सकता है और इसके बाद निवेशकों को कुछ न कुछ रकम तो मिल ही जाएगी। उनका कहना है कि इन कंपनियों से प्रवर्तक तो पहले ही बाजार में अपनी अधिकांश हिस्सेदारी बेचकर निकल चुके हैं। इसलिए सेबी अगर आम निवेशकों के हितों की रक्षा का दम भरती है तो उसे जरूर आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए।

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