माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं से बैंकों की बेरुखी

मंदी से मुक्त माना जानेवाला माइक्रो फाइनेंस क्षेत्र भी अब आर्थिक सुस्ती का शिकार हो गया है। इस क्षेत्र को बैंकों से मिलनेवाला धन कुछ साल पहले तक मिल रहे धन का अब मामूली हिस्सा रह गया है। बैंक माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं (एमएफआई) को बगैर बैलेंस शीट देखे कर्ज देने से मना कर रहे हैं। इससे छोटी एमएफआई के लिए भारी मुसीबत पैदा हो गई है क्योंकि वे आमतौर पर बैलेंस शीट नहीं बनाती। केवल बड़ी एमएफआई ही बैलेंस शीट की व्यवस्था अपनाती हैं।

माइक्रो फाइनेंस संस्थाएं गरीबों को बैंकिंग सुविधाएं या आसान शब्दों में कहें तो छोटे-छोटे कर्ज उपलब्ध कराती है। अपने यहां बैंक इन संस्थाओं को उधार देते हैं जिन्हें वे बैकिंग दायरे से बाहर छूट गए लोगों तक पहुंचा देती हैं। अभी तक बैंकों और इन संस्थाओं, दोनों के लिए फायदे की स्थिति थी। एमएफआई को बैंकों से सस्ता धन मिल जाता था और बैंक इन्हें उधार देकर परोक्ष रूप से प्राथमिक क्षेत्र को 40 फीसदी कर्ज देने की अनिवार्य शर्त पूरी कर लेते थे। लेकिन वैश्विक वित्तीय संकट और भावी फंडिंग की अनिश्चितता ने बैंकों को काफी चौकन्ना कर दिया है। उन्हें संदेह है कि पिछले कुछ सालों से जबरदस्त तेजी से बढ़ रहा माइक्रो फाइनेंस क्षेत्र अपनी गति बनाए रख पाएगा कि नहीं।

इलाहाबाद की सोनाटा माइक्रो फाइनेंस के मुख्य वित्त अधिकारी राकेश दुबे कहते हैं कि अगर माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं को साल भर के लिए भी धन नहीं मिला तो वे बंद हो जाएंगी और उनकी 4-5 साल की सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा। बैंकों को समझना चाहिए कि हमारा व्यवसाय दूरगामी है जिसमें पांच साल तक लगते हैं। दूसरी तरफ बैंकों का कहना है कि माइक्रो फाइनेंस क्षेत्र को उन्होंने मदद बंद नहीं की है। हां, इसमें ज्यादा एक्सपोजर ठीक नहीं होगा। आईसीआईसीआई बैंक में माइक्रो फाइनेंस का कामकाज देखनेवाले महाप्रबंधक कुमार आशीष कहते हैं कि पिछले पांच सालों में माइक्रो फाइनेंस से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को काफी गति मिली है, लेकिन अब इन संस्थाओं को अपनी बुनियाद मजबूत करने की जरूरत है।

रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड में माइक्रो फाइनेंस से जुड़ी मौमिता सेनसर्मा तो यहां तक मानती है कि अब इस क्षेत्र में थोड़ा धीमापन आना चाहिए। इससे उन्हें अपना सिस्टम सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी और उन्हें कर्ज देने का जोखिम घट जाएगा। लेकिन बैंकों के इस रुख के बावजूद कुछ एमएफआई का भरोसा डिगा नहीं है। सामुदायिक विकास से जुड़ी संस्था साधन के अधिकारी टाइटस मैथ्यू कहते हैं कि बैंकों के इस रवैये से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। इस साल धीमेपन के बावजूद एमएफआई का विकास पिछले साल के 70 फीसदी से कुछ ही कम रहेगा। इन संस्थाओं को बैंकों के अलावा इंटेलकैप और ग्रामीण कैपिटल जैसे इनवेस्टमेंट बैंकरों से भी मदद मिलती है और उनका रुख अभी तक बेहतर है। अभी भी इंडसइंड बैंक, यस बैंक और आईसीआईसीआई बैंक बंधन और एसकेएस जैसी संस्थाओं को कृषि और संबंधित गतिविधियों के लिए कर्ज दे रहे हैं। ये संस्थाएं बैंकों को कर्ज वसूली में भी मदद करती हैं।

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