कोई ट्यूलिप नहीं है यूलिप

राजेश के मिश्र

बड़ी विचित्र स्थिति है। बीमा के नाम पर आम अनजान लोगों को यूलिप (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी) की घुट्टी पिलाई जा रही है। बीमा नियामक संस्था आईआरडीए के मुताबिक यूलिप में पी का मतलब प्लान नहीं, पॉलिसी है। लेकिन हकीकत में तो यह प्लान ही है, निवेशकों को छलने का एक तरह का गेम-प्लान क्योंकि इसका केवल 2 फीसदी हिस्सा पॉलिसीधारक की बीमा में जाता है और 98 फीसदी निवेश में। बीमा कंपनियां कहती हैं कि हर कोई इस समय निवेश की बात सोचता है, पैसे से पैसे बनाने की बात सोचता है। ऐसे में अगर हम निवेश के लाभ वाली यूलिप न बेचें तो कोई बीमा पॉलिसी खरीदेगा ही नहीं।

लेकिन सवाल उठता है कि निवेश की जलेबी दिखाकर भी आपने अभी तक कितने ग्राहक खींच लिए? खुद आईआरडीए के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी 2010 के अंत तक देश में बेची गई यूलिप पॉलिसियों की कुल 7.20 करोड़ है जिनमें जमा प्रीमियम की रकम 1,35,256 करोड़ रुपए है। दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें से 16.7 लाख नई यूलिप पॉलिसियां 1 अप्रैल 2009 से 28 फरवरी 2010 के बीच बेची गई हैं और उनसे 44,611 करोड़ रुपए का प्रीमियम जुटाया गया। साफ है कि बीमा कंपनियां यूलिप को ठेल रही हैं। यहां तक कि हमारी सबसे पुरानी और बड़ी जीवन बीमा कंपनी भी अब अपनी हर नई पॉलिसी में यूलिप जैसा तड़का लगा देती है।

गौर करने लायक बात यह है कि जिस देश में खाते-पीते मध्यवर्ग की ही संख्या 25-30 करोड़ हो, वहां दस सालों के उदारीकरण और यूलिप के आकर्षण के बावजूद बीमा कंपनियां 5 करोड़ लोगों तक क्यों पहुंच पाई हैं। 5 करोड़ की बात इसलिए क्योंकि बहुत सारे लोगों ने एक की जगह दो-दो, तीन-तीन यूलिप पॉलिसियां ले रखी हैं। यह संख्या ही दिखाती है कि झोल कहीं और है। एलआईसी न होती तो शायद बीमा कभी आबादी के बीच इतनी भी पहुंच नहीं बना पाती।

पहली बात तो यह है कि बीमा जीवन की अनिश्चितताओं के बीच आपके आश्रितों को एक सहारा उपलब्ध कराती है। आकस्मिकता में यह आपके स्वास्थ्य खर्च को जुटाने में मददगार बन जाती है। दुर्घटना व चोरी वगैरह की सूरत में आपके माल-असबाब व प्रॉपर्टी पर लगा पूरा झटका आप पर नहीं आने देती। बीमा मूलतः एक तरह का खर्च है, उसी तरह जैसे आप कपड़े या भोजन पर खर्च करते हैं। वह पैसे से पैसे बनाने का निवॆश नहीं है। वह तो पैसे से अनिश्चितता व आकस्मिकता को नांधने के लिए किया गया उपक्रम है।

देश में सक्रिय जीवन बीमा कंपनियों की संस्था 23 हो गई है। साधारण बीमा कंपनियों की तादाद भी 22 की हो गई है। साधारण बीमा का धंधा ज्यादातर कंपनियों व बड़े व्यवसाय से जुड़ा रहता है। दुकानदार वगैरह भी उनसे बीमा कराने लगे हैं। हर तरह के मोटर वाहन का बीमा अनिवार्य है तो सभी कराते ही हैं। स्वास्थ्य बीमा भी सामूहिक व निजी योजनाओं में चलता है। ऐसे में सबसे बुरा हाल जीवन बीमा का है।

जीवन बीमा के नाम पर वाकई आम लोगों के साथ छल किया जाता है। पूरी बात बताई नहीं जाती। पूरे खर्च बताए नहीं जाते। इस समय तो ज्यादातर कंपनियां यूलिप ही बेचती हैं। इनमें बीमा कवर तो पहले साल के प्रीमियम 5 से 10 गुना होता है। लेकिन एजेंट या कंपनी के प्रतिनिधि बताते हैं कि कैसे आपके चंद हजार 15-20 साल में करोड़ बन जाएंगे। फिर आप चाहें तो केवल तीन साल तक प्रीमियम भर कर निश्चिंत हो सकते हैं। बाद में पता चलता है कि पहले तीन साल में जमा प्रीमियम का 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा न जाने किन खर्चों में काट लिया गया है और आपका निवेश बमुश्किल 30 फीसदी का हुआ है। ऐसे में आपका पैसा क्या खाक बढ़ेगा? लेकिन एजेंट को मोटा कमीशन तीन साल के लिए ही मिलता है तो वह आपको पॉलिसी बेचकर चंगा हो जाता है।

इसके बजाय वह अगर शुद्ध जीवन बीमा पॉलिसी या टर्म इश्योरेंस बेचता तो उसे काफी कम कमीशन मिलता। साथ ही उतने ही सुरक्षा कवर के लिए आपके प्रीमियम की राशि बहुत कम होती। इसलिए मुझे तो लगता है कि सेबी ने बहुत अच्छा कर रहा है जो यूलिप के निवेश हिस्से का पंजीकरण अपने तहत लाना चाहता है। आदर्श स्थिति यह होगी कि बीमा कंपनियां टर्म इश्योरेंस ही बेचें, जिससे हमारे न रहने पर हमारे परिवार को थोड़ी मदद मिल जाएगी। बाकी रकम हमें अगर बढ़ानी है तो उसे हम म्यूचुअल फंडों में लगाएं क्योंकि वहां तो पिछले साल अगस्त से शुरुआती कमीशन का फैसला भी हम पर छोड़ दिया गया है।

लेखक एक बीमा कंपनी से जुड़े हैं

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