शेयर बाजार में चलती है 94.5% नोटबाजी

देश में आर्थिक सुधारों के लागू होने के लगभग दो दशक बाद भी हमारे शेयर बाजार में पूंजी नहीं बनती, नोट बनते हैं। बाजार में रोज के कारोबार का औसतन 75 फीसदी हिस्सा फ्यूचर्स व ऑप्शंस के डेरिवेटिव सौदों से आता है। डेरिवेटिव कांट्रैक्ट वास्तविक शेयरों की छाया की तरह होते हैं, जिनके बदले शेयर भी लिए जा सकते हैं। लेकिन अपने यहां अब भी इनका निपटान नोट में किया जाता है। भौतिक डिलीवरी का फैसला हाल ही में सेबी ने लिया है, पर अभी तक इस पर अमल नहीं हुआ है। दूसरी तरफ शेयर बाजार में जो एक चौथाई कारोबार कैश सेगमेंट में होता है, उसका भी 78 फीसदी हिस्सा डे-ट्रेडिंग या इंट्रा-डे सौदों का है। ये सौदे दिन के दिन में भावों का अंतर ले-देकर निपटा लिए जाते हैं। इस तरह भारतीय शेयर बाजार में 94.5 फीसदी कारोबार सट्टेबाजी का है और केवल 5.5 फीसदी कारोबार ही ऐसा है जिससे सचमुच पूंजी का निर्माण होता है। हालत यह है कि कैश सेगमेंट में रिटेल निवेशक सट्टा खेलते हैं तो डेरिवेटिव सेगमेंट संस्थागत निवेशकों के खेल का अखाड़ा बना हुआ है।

इस हकीकत उजागर होती है जानीमानी अंतरराष्ट्रीय सलाहकार फर्म मैकेंजी और उद्योग संगठन फिक्की की ताजा अध्ययन रिपोर्ट से। शायद यही वजह है शेयर बाजार में रिटेल निवेशकों की भागीदारी घटती जा रही है। अब भी कंपनियों की इक्विटी में प्रवर्तकों से इतर रिटेल निवेशकों का हिस्सा 10 फीसदी के आसपास है और पिछले सात सालों के दरम्यान इसमें 3 फीसदी की कमी आई है। हालांकि पिछले सालों में हमारा बाजार पूंजीकरण 6 गुना और कारोबार के मूल्य में 3.5 गुना का इजाफा हुआ है। लेकिन साथ ही साल 2000 से 2009 के बीच जहां दुनिया के तमाम बाजारों का आधार व्यापक हुआ है, वहीं हमारा शेयर बाजार सिकुड़ता गया है। कुल सौदों के मूल्य को अगर बाजार के पूंजीकरण से भाग दें तो यह अनुपात (ट्रेडिंग वेलोसिटी या कारोबार का वेग) साल 2000 में 1.7 था, लेकिन 2009 तक यह घटकर 0.8 पर आ गया। इसका पता इस बात से चलता है कि हमारे यहां वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान शेयर बाजार में सूचीबद्ध 7882 कंपनियों में से औसतन 2923 कंपनियों (37 फीसदी) के शेयरों में ही ट्रेडिंग हुई है। पिछले दस सालों में चीन जैसी नियंत्रित अर्थव्यवस्था में भी कारोबार का वेग 1.2 से बढ़कर 1.9 हो गया है।

डेरिवेटिव सौदों के मायने में हमने 75 फीसदी के आंकड़े के साथ अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देशों को पीछे छोड़ रखा है। चीन में डेरिवेटिव सौदे होते ही नहीं। जापान में इनका हिस्सा 55 फीसदी, अमेरिका में 48 फीसदी, कनाडा में 30 फीसदी और ब्रिटेन में 26 फीसदी है। हां, हांगकांग 76 फीसदी के साथ हमसे थोड़ा आगे है और जर्मनी 94 फीसदी के साथ हमसे बहुत आगे है। देश के शेयर बाजार की हालत पर चिंता जताते हुए प्राइम डाटाबेस के चेयरमैन पृथ्वी हल्दिया ने जुलाई 2009 में वित्त मंत्रालय को बजट से पहले पत्र लिखा था कि इक्विटी निवेश को हमेशा दूरगामी निवेश बताया जाता है। पर दुर्भाग्य से हमारे शेयर बाजारों में डे-ट्रेडिंग हावी है। यहां 75 फीसदी से ज्यादा सौदे उसी दिन काट दिए जाते हैं। हमारे शेयर बाजार जुआखाना बन गए हैं।
फिक्की-मैकेंजी की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय शेयर बाजार के आधार के सिमटे होने की एक वजह यह भी है कि यहां डीमैट खाता खोलना मंहगा और समयलेवा है। जहां बैंक के बचत खाते पर बैंक का औसत खर्च 150 रुपए और ग्राहक का खर्च शून्य होता है, वहीं डीमैट खाते पर ब्रोकर का खर्च 300-700 रुपए होता है, जबकि ग्राहक को खाता खोलने पर 700 रुपए और उसे चलाने के लिए साल भर में 500 रुपए देने पड़ते हैं। बचत खाता 3-4 दिन में खुल जाता है तो डीमैट खाते को खुलवाने में 10-15 दिन लग जाते हैं।

इसके अलावा भारत में ब्रोकरेज, टैक्स व अन्य खर्चों के जोड़कर बाजार में प्रति सौदा लागत दूसरे देशों से काफी ज्यादा है। भारत में यह 37.6 आधार अंक (100 आधार = एक फीसदी) है, तो अमेरिका में 12.5, जर्मनी में 19.8, सिंगापुर में 26.5 और हांगकांग में 32.2 आधार अंक है। हालांकि चीन में यह भारत से ज्यादा 43.5 आधार अंक है। रिपोर्ट का कहना है कि भारत में डेरिवेटिव व कैश सौदों के अंतर को पाटने के लिए शेयर उधार लेने-देने (एसएलबी) की व्यवस्था को ठीक किया जाना चाहिए। चौंकानेवाली बात है कि अपने यहां वित्त वर्ष 2009-10 में कुल 10 लाख रुपए से भी कम के एसएलबी सौदे हुए हैं, जबकि हांगकांग व ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में ऐसे सौदों का टर्नओवर 7000 करोड़ डॉलर से ज्यादा रहता है।

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