बहुत कम लोग हैं जिन पर देश-दुनिया का फर्क पड़ता है। इनमें से भी ज्यादातर लोग भावना में बहकर पूरा सच नहीं देख पाते, गुमराह हो जाते हैं। स्वार्थ में धंसे दुनियादार लोग उन पर हंसते है, तरस खाते हैं।और भीऔर भी

हर दिन देश-दुनिया व समाज में इतना कुछ घटित होता है कि उन्हें जानकर हम एक ही दिन में परम ज्ञानी बन सकते हैं। लेकिन नजर की सीमा और आत्मग्रस्तता के कारण हम बहुत कुछ देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी

आपकी नजर ही हद क्या है? कहां तक देख पाते हो आप? अपने तक, परिवार तक, समुदाय तक, समाज तक, देश-दुनिया तक या हर तरफ फैली प्रकृति तक। इसी से तय होता है आपके सुखी होने का स्तर।और भीऔर भी