अपना हाल हम ही जानते हैं या मानते हैं कि भगवान जानता है। दूसरों का हाल हम पूछते नहीं, न ही उसकी परवाह करते हैं। लेकिन चाहते हैं कि दूसरा हमारी परवाह करे। नहीं करता तो उसे निपट स्वार्थी बताते हैं। पर, अपनी तरफ देखने की जहमत नहीं उठाते।और भीऔर भी

ज़िंदगी में सुरक्षा की ही नहीं, असुरक्षा की भी ज़रूरत होती है। बूढ़े या असहाय लोग सुरक्षा की चाह रखें तो समझ में आता है। लेकिन नौजवानों के लिए यह चाह अच्छी नहीं क्योंकि असुरक्षा के बिना वे जीवन के तमाम जरूरी सबक नहीं सीख पाते।और भीऔर भी

मरना हमारी मजबूरी है। लेकिन जीना भी तो एक तरह की मजबूरी है। मरने की मजबूरी को हम बदल नहीं सकते। लेकिन जीने की मजबूरी को हम चाहें तो अपनी सक्रियता से जश्न में बदल सकते हैं।और भीऔर भी

जब आप सबका बनना चाहते हो तो अपना सारा कुछ उसके अधीन कर देना चाहिए। ध्यान रखें कि सबका बनने की चाह और अपना कुनबा अलग चलाने की कोशिश आपको कहीं का नहीं छोड़ती।और भीऔर भी