भावे हुए पस्त, म्यूचुअल फंड उद्योग से कहा – आप ही लाओ पॉलिसी पेपर

पिछले साल अगस्त से ही म्यूचुअल फंड उद्योग को दुरुस्त करने और उसमें रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश में लगे सेबी चेयरमैन सी बी भावे ने लगता है हथियार डाल दिए हैं। बुधवार को मुंबई में उद्योग संगठन सीआईआई (कनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री) के म्यूचुअल फंड सम्मेलन में उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड उद्योग को खुद ही एक आम नीति का प्रस्ताव पेश करना चाहिए कि इस उद्योग को कैसे संचालित किया जाए।

सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए भावे ने कहा कि यह शायद एम्फी (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के लिए वाजिब होगा कि वह इस बात पर विमर्श करे कि वह कोई प़ॉलिसी पेपर ला सकता है या नहीं। अगर उद्योग में गतिशीलता लानी है तो उद्योग को पहल करनी होगी। बता दें कि 1 अगस्त 2009 से पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने म्यूचुअल फंडों के लिए जब से एंट्री लोड खत्म किया है, तब से यह उद्योग दबाव में है। उद्योग की शिकायत यह है कि कमीशन न मिलने के कारण डिस्ट्रीब्यूटर म्यूचुअल फंड के बजाय यूलिप (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी) बेचने लगे हैं क्योंकि उसमें उन्हें पहले दो सालों में प्रीमियम का 70 फीसदी तक हिस्सा बतौर कमीशन मिल जाता है।

इसके बाद सेबी ने कोशिश की कि यूलिप के निवेशवाले हिस्से को अपने अधिकार क्षेत्र में लाया जाए। लेकिन कानूनी तौर पर मजबूत होने के बावजूद उसे इसमें मुंह की खानी पड़ी क्योंकि बीते हफ्ते सरकार ने अध्यादेश जारी कर यूलिप पर बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) का सर्वाधिकार स्थापित कर दिया है। इस बीच सेबी बराबर म्यूचुअल फंड के लिए कुछ न कुछ नया नियम बनाता जा रहा है। जैसे, उसने तय कर दिया है कि फंड अपने निवेशकों को प्रीमियम खाते से लाभांश नहीं दे सकते। साथ ही यह कि अल्पकालिक ऋण फंड पर उन्हें बाजार के मूल्य के हिसाब से एनएवी तय करना होगा।

इन कदमों ने म्यूचुअल फंड उद्योग की परेशानी और बढ़ा दी है। अभी तक उसने कॉरपोरेट क्षेत्र के निवेश की बदौलत अपनी आस्तियों (एयूएम) में बढ़त बरकरार रखी है। अगस्त 2009 में उसकी कुल आस्तियां 7.50 लाख करोड़ रुपए थीं, जो 7.33 फीसदी बढ़त के साथ मई 2010 में 8.05 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गई हैं। लेकिन इसका तकरीबन आधा हिस्सा कॉरपोरेट क्षेत्र के निवेश का है। इधर रिटेल निवेशक म्यूचुअल फंड से दूर भाग रहे हैं। इसका प्रमाण यह है कि इस साल फरवरी से मई के बीच म्यूचुअल फंडों के इक्विटी पोर्टफोलियो की संख्या में 6 लाख की कमी आई है। दूसरी समस्या यह भी है कि म्यूचुअल फंड स्कीमों का 74 फीसदी निवेश इस समय देश के दस बड़े शहरों से आ रहा है।

लेकिन सेबी चेयरमैन इस ठहराव को तोड़ने की राह सुझाने के बजाय यथास्थिति को जायज ठहराने का तर्क पेश कर रहे हैं। सीआईआई के सम्मेलन में उनका कहना था कि भारतीय आबादी के बड़े हिस्से का रिस्क प्रोफाइल अभी तक पूंजी बाजार के माफिक नहीं बन पाया है और लोगबाग अपनी छोटी बचत को सुरक्षा के मद्देनजर कहीं और निवेश करने के बजाय बैंकों में रखना बेहतर समझते हैं।

बता दें कि सीआईआई के एक दिवसीय सम्मेलन में म्यूचुअल फंड उद्योग की दिग्गज हस्तियों ने शिरकत की है। सीआईआई लगातार छह सालों से म्यूचुअल फंड पर सालाना सम्मेलन आयोजित करता रहा है। इस बार के सम्मेलन का विषय था – 2015 तक भारतीय म्यूचुअल उद्योग का विकास-पथ। सम्मेलन में इस सिलसिले में सीआईआई ने प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स के साथ मिलकर एक रिपोर्ट भी जारी की। इस रिपोर्ट में म्यूचुअल फंड उद्योग की ताजा स्थिति, चुनौतियां और भावी दिशा का खाका पेश किया गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *