10 घंटे नहीं, 10 साल का नजरिया

मैं दस साल के नजरिए से अर्थव्यवस्था और बाजार व कॉरपोरेट क्षेत्र की स्थिति को देखता हूं। इसलिए महसूस कर सकता हूं कि क्या हो रहा है। लेकिन निवेशक तो दस घंटे की बात भी नहीं देख पाते। इसलिए बाजार के खिलाड़ियों के हाथ में अपनी गरदन पकड़ा देते हैं। मैं भी एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल) निवेशकों को उनका पोर्टफोलियो बनाने-संभालने की सलाह देता हूं। लेकिन उन्हें नुकसान नहीं हुआ क्योंकि वे कभी भी कर्ज लेकर बाजार में पैसे नहीं लगाते। अभी तो मैं उन्हें रीयल्टी स्टॉक्स को खरीदने को कह रहा हूं।

बाजार में निचले स्तर पर की गई खरीद से हमारी लागत कम रहेगी और अगले साल भर हम निश्चिंत होकर सौदे करते रहेंगे। याद रखें, अब से सात दिनों में बाजार वहां पहुंच जाएगा, जहां से वो गिरना शुरू हुआ था। छोटी अवधि की बात करें तो बाजार सुधरने की राह पर चलेगा और घोटाले पर सीबीआई व अन्य एजेंसियों की किसी बड़ी कार्रवाई से बाजार तेजी से ऊपर-नीचे हो सकता है लेकिन निफ्टी 5700 से नीचे नहीं जाएगा। ऊपर की दिशा में बाजार पहले 6000 का स्तर तोड़ने की कोशिश करेगा और एक बार इसके पार जाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। मेरा मानना है कि अगले 60 दिनों में हम नई ऊंचाई पकड़ लेंगे क्योंकि आर्थिक कारक इतने मजबूत हैं कि ऐसे घोटालों को आराम से किनारे लगा सकते हैं।

रीयल्टी सेक्टर में जरूरत से ज्यादा करेक्शन आ चुका है क्योंकि न तो रियल एस्टेट की कीमतें गिरनेवाली हैं और न ही इसकी मांग सुस्त पड़नेवाली है। असल में पनवेल (मुंबई) में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की मंजूरी ने रीयल्टी सेक्टर में नया आयाम जोड़ दिया है। मनी मैटर्स द्वारा रिश्वत खिलाने का मामला घोटाला था या महज रिश्वतखोरी, इसे सरकार को साफ करने दीजिए। हालांकि शेयर बाजार ने इस पर ऐसा तूफान मचाया जैसे यह कोई 46,000 करोड़ रुपए का घोटाला था। निश्चित रूप से यह बाजार की अति-प्रतिक्रिया थी।

अगर आप रिटेल निवेशकों को कोई भली सलाह दें तो वे आज इसे नहीं मानेंगे। वे हमेशा भय और लालच से संचालित होते हैं। गिरता हुआ बाजार उनका भय बढ़ा देता है और बढ़ता हुआ बाजार उनकी लालच में चासनी घोल देता है। निवेशकों को किसी स्टॉक को समझने के लिए एक व्यवस्थित तरीका अपनाना चाहिए और देखना चाहिए कि घोटाला हो या न हो, क्या इस स्टॉक का मूल्य नीचे जाएगा? अगर ऐसे मौके पर विदेशी निवेश टूटकर निवेश करते और नोट बनाते हैं जबकि रिटेल निवेशक सकारात्मक सोच न रखने के कारण हाथ मलते रह जाते हैं तो इसके लिए कौन दोषी है!!

इस समय रीयल्टी मेरा सबसे उम्दा दांव है। अगले दस सालों में भारत में रीयल्टी की जरूरत अमेरिका तक की मांग को पार कर जाएगी जिससे इस सेक्टर में जबरदस्त रैली आएगी। यहां भी मैं केवल उन्हीं रीयल्टी स्टॉक्स के पक्ष में हूं जिनको मामूली या बगैर लागत के जमीन मिली हुई है। मैं रीयल्टी कंपनियों के नए इश्यू से दूर ही रहूंगा क्योंकि एक तो उन पर कर्ज का भारी बोझ होता है, दूसरे उनमें बड़ा बनने की हायतौबा मची रहती है और तीसरे उनके संचालन में कॉरपोरेट गवर्नेंस के मानकों का अभाव रहता है।

रीयल्टी के बाद में घरेलू उपभोग वाले उद्योगों पर दांव लगाऊंगा क्योंकि भारत व चीन के पास अगले दस सालों में इस क्षेत्र का 77 फीसदी बाजार होगा। उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में लगी कंपनियों के शेयरों में दो से तीन साल के लिए निवेश करना चाहिए और इतने वक्त में आपको कई गुना रिटर्न मिल सकता है।

फर्टिलाइजर, छोटी आईटी कंपनियां, केमिकल्स, रिसर्च, आइरन ओर, निजी तेल व गैस कंपनियां, मैगनीज ओर और ग्लास अन्य सेक्टर हैं जहां निवेशकों को अपना पैसा लगाना चाहिए। निवेशकों को मेरी सलाह है कि वे सरकारी तेल व गैस कंपनियों, ब्रोकिंग, बैंकिंग और ऑटो क्षेत्र के स्टॉक्स से बचकर रहें क्योंकि इन्हें कभी भी अचानक डाउनग्रेड किया जा सकता है। हां, बैंकिंग क्षेत्र में एसबीआई और आईडीबीआई बैंक इसके अपवाद हैं।

चरित्र पेड़ है तो प्रतिष्ठा उसकी छाया। छाया तो लोगों की सोच के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है। लेकिन असली मायने पेड़ और उसकी ऊंचाई का है।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ हैलेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होगा। यह कॉलम मूलत: सीएनआई रिसर्च से लिया जा रहा है)

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