यूरिया से मूल्य-नियंत्रण हटाने के लिए बनेगा अफसरों का पैनल

सरकार यूरिया से मूल्य-नियंत्रण हटाने की तरफ तेज कदमों से बढ़ रही है। बुधवार को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और उवर्रक राज्य मंत्री श्रीकांत जेना उर्वरक उद्योग के प्रतिनिधियों से मिले। समाचार एजेंसी रायटर्स के अनुसार इस मुलाकात के बाद उन्होंने एक पैनल बनाने का निर्णय लिया है जिसमें उर्वरक मंत्रालय, कृषि मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के शीर्ष अधिकारी शामिल रहेंगे। यह पैनल यूरिया के मूल्य से सरकारी नियंत्रण हटाने की संभाव्यता पर विचार करेगा।

असल में किसान अपनी फसलों में सबसे ज्यादा यूरिया खाद का ही इस्तेमाल करते हैं। इस पर मूल्य-नियंत्रण हटाना राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मसला है। इसलिए सरकार बहुत फूंक-फूंककर कदम रखना चाहती है। वह माहौल भांपने के लिए इस साल फरवरी में यूरिया के मूल्य 10 फीसदी बढ़ा चुकी है। इसका तमाम किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने काफी विरोध किया। उनका कहना था कि इससे खेती की लागत और बढ़ जाएगी जिससे देश की व्यापक ग्रामीण आबादी पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

लेकिन सरकार अपनी तरफ से यूरिया पर सब्सिडी खत्म कर देना चाहती है। चालू वित्त वर्ष 2010-11 के बजट में यूरिया सब्सिडी के लिए 21,480 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। सरकार का कहना है कि इस तरह की सब्सिडी से देश का राजकोषीय घाटा बढ़ता है जिस पर लगाम लगाना जरूरी हो गया है। बता दें कि इस साल राजकोषीय घाटे का बजट अनुमान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5.5 फीसदी रखा गया है। हालांकि इसके बढ़ने का नहीं, बल्कि घटने का ही अनुमान है क्योंकि सरकार को 3जी व ब्रॉडबैंड की नीलामी और सरकारी कंपनियों के विनिवेश से अनुमान से बहुत ज्यादा धन मिल रहा है।

एक मंत्री के अनुसार, तीन मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारी आपस में यूरिया से मूल्य-नियंत्रण हटाने पर विचार-विमर्श करने के बाद अपनी रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को भेजेंगे। लेकिन पूरी प्रक्रिया में अभी कम से कम दो महीने लग जाएंगे। बता दें कि फसलों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश उर्वरकों में किसान सबसे ज्यादा नाइट्रोजन आधारित उर्वरक यूरिया का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे कृषि भूमि की उर्वरता पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। इसके बावजूद हमारी कृषि पैदावार चीन या यूरोप की तुलना में लगभग आधी है और हमें चीनी व खाद्य तेलों समेत कभी-कभी गेहूं व चावल तक आयात करना पड़ता है।

वैसे, यूरिया सब्सिडी से उर्वरक कंपनियों को कोई सीधा नुकसान नहीं होता क्योंकि सरकार उनके पूरे नुकसान की भरपाई कर देती है। सब्सिडी की रकम उर्वरक कंपनियों को ही मिलती है। लेकिन मूल्य-नियंत्रण हटने और सब्सिडी खत्म किए जाने के अंदेशे में बुधवार को कई उर्वरक कंपनियों के शेयरों में बढ़त दर्ज की गई। सरकारी कंपनी राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स के शेयर 17.51 फीसदी बढ़कर 122.50 रुपए पर बंद हुए तो बिड़ला समूह की कंपनी चंबल फर्टिलाइजर्स के शेयर 98.20 रुपए की नई ऊंचाई पर पहुंचने के बाद 6.94 फीसदी की बढ़त के साथ 92.40 रुपए पर पहुंच गए।

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