पहली छमाही में ही सरकार के पांव चादर से 71% बाहर, घाटे की चिंता

देश का राजकोषीय घाटा चालू वित्त वर्ष 2011-12 में सितंबर तक के छह महीनों में ही पूरे साल के बजट अनुमान का लगभग 71 फीसदी हो चुका है, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2010-11 की पहली छमाही में यह बजट अनुमान का 34.9 फीसदी ही था।

वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार राजकोषीय घाटा अप्रैल-सितंबर 2011 के बीच 1.92 लाख करोड़ रुपए रहा है, जबकि पूरे वित्त वर्ष का बजट लक्ष्य 4.13 लाख करोड़ रुपए रखा गया है। इस तरह लक्ष्य का 70.70 फीसदी तो पहले छह महीनों में ही गले पड़ चुका है।

इस आधार पर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि साल के अंत तक राजकोषीय घाटा असल में जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 5.8 फीसदी तक हो सकता है, जबकि बजट अनुमान 4.6 फीसदी का ही है। मुंबई में कार्यरत बार्कलेड कैपिटल के अर्थशास्त्री सिद्धार्थ सान्याल का कहना है, “सरकारी आंकड़ा अपेक्षा के अनुरूप है। पूरी आशंका इस बात की है कि राजकोषीय घाटा लक्ष्य के पार चला जाएगा और यह अंतर काफी ज्यादा हो सकता है।”

उनका अनुमान है कि यह जीडीपी का कम से कम 5.3 फीसदी रहेगा। बता दें कि पहले छह महीनों में सरकार का कर राजस्व 2.43 लाख करोड़ रुपए रहा है, जबकि कुल खर्च 5.99 लाख करोड़ रुपए का रहा है। इन दोनों का अंतर 3.56 लाख करोड़ रुपए का निकलता है। सरकार को कर-भिन्न प्राप्तियों से 1.64 लाख करोड़ रुपए मिले हैं। इसलिए घाटे की रकम 1.92 लाख करोड़ रुपए निकलती है।

सरकार मानती है कि राजकोषीय घाटे को काबू में रखना उसके लिए बड़ी चुनौती है। लेकिन वित्त मंत्रालय के आला अधिकारियों ने भरोसा जताया है कि इसे जीडीपी के पांच फीसदी के भीतर रखना संभव है। हालांकि जानकारों को भरोसा नहीं है कि क्योंकि सरकार दूसरी छमाही में अपनी उधारी का लक्ष्य 52,800 करोड़ रुपए बढ़ा चुकी है।

असल में एक तो सरकार पर कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों के चलते सब्सिडी का दबाव बढ़ गया है। दूसरे रुपए के कमजोर होने से आयात का खर्च बढ़ गया है। तीसरे 40,000 करोड़ रुपए का विनिवेश लक्ष्य किसी भी सूरत में सफल होता नहीं दिख रहा।

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