करुणा व कल्याण

दया, ममता व करुणा किसी और के कल्याण से ज्यादा अपनी संतुष्टि के भाव हैं। इसलिए दीन-हीन और कमजोर बनकर दुनिया नहीं जीती जा सकती। अपनी दुनिया औरों के भरोसे नहीं चल सकती।

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