जर्मन मूल की ग्लोबल ई-पेमेंट कंपनी वायरकार्ड ने बैंकिंग और इसके नजदीकी धंधों में अपने हाथ-पैर पूरी दुनिया में फैला रखे थे। फिर भी उसका कद ऐसा नहीं है कि इसी 25 जून को उसके दिवाला बोल देने से दुनिया के वित्तीय ढांचे पर 2008 जैसा खतरा मंडराने लगे। अलबत्ता, जिस तरह इस मामले में एक बड़ी ग्लोबल एकाउंटेंसी फर्म अर्न्स्ट एंड यंग की सांठ-गांठ सामने आई है, उसे देखते हुए तमाम छोटे-बड़े निवेशकों में डर समाऔरऔर भी

कोई भी अर्थव्यवस्था नई रिसर्च, नए आविष्कार और नई चीजें लाने या नवाचार पर जोर देने से बढ़ती है। लेकिन भारत बिजनेस करने की आसानी में इधर थोड़ा सुधरने के बावजूद वैश्विक नवाचार सूचकांक (ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स) में 2007 के 23वें स्थान से खिसककर 2015 में 81वें स्थान पर पहुंच गया है। इसकी खास वजह यह है कि भारत में सरकार के साथ-साथ कॉरपोरेट क्षेत्र भी रिसर्च व अनुसंधान (आर एंड डी) पर खर्च घटाता जा रहाऔरऔर भी

विश्व के जीडीपी में अमेरिका का योगदान 23% और वस्तु व्यापार में 12% ही है। फिर भी दुनिया का 60% उत्पादन और लोग उन देशों में हैं जिनकी मुद्रा की सांसें डॉलर में अटकी हुई हैं। अमेरिका ने दुनिया में अपना आधिपत्य 1920 से 1945 के दौरान ब्रिटेन को पीछे धकेलकर बनाया। लेकिन डॉलर की ताकत बनी रहने के बावजूद इधर अमेरिका की आर्थिक औकात कमजोर हो रही है। अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट निवेश में अमेरिकी कंपनियों का हिस्साऔरऔर भी

हम में से हर कोई ऐसे बैक्टीरिया का झुंड या बादल लिए चलता है जो आपस में इतना अलग है कि उंगलियों के निशान या पुतलियों की बनावट की तरह हमारी पहचान का माध्यम बन सकता है। यह बात अमेरिका के ओरेगॉन विश्वविद्यालय की एक रिसर्च रिपोर्ट से सामने आई है। इस रिपोर्ट के मुख्य लेखक जेम्स मीडो का कहना है, “हमें उम्मीद थी कि हमें किसी व्यक्ति के आसपास धूल और उसके शरीर व कपड़ों सेऔरऔर भी

हम बैंकों की एफडी, डाकघर बचत, पीपीएफ या लघु बचत योजनाओं में जो भी धन जमा करते हैं, उससे सरकार को सस्ता कर्ज मिल जाता है जिससे वह आमदनी से ज्यादा की गई फिजूलखर्ची या अपने राजकोषीय घाटे को पाटती है। इसी क्रम में उसने किसान विकास पत्र (केवीपी) को फिर से ज़िदा किया है। लेकिन खुद वित्त मंत्री जेटली ने बताया है कि यह करेंसी नोटों जैसा एक बियरर प्रपत्र है जिस पर किसी का नामऔरऔर भी

आम धारणा है कि पंजाब और केरल से सबसे ज्यादा मजदूर विदेश में कमाने जाते हैं। खाड़ी के देश, खासकर अरब के देश इनके खास ठिकाने हैं। लेकिन हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश अरब देशों को मजदूर भेजने में सबसे आगे हो गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2012 में उत्तर प्रदेश से 1.91 लाख मजदूर अरब देशों में काम करने गए। इसके बाद केरल (98,000), आंध्र प्रदेश (92,000), बिहार (84,000), तमिलनाडु (78,000), राजस्थान (50,000) औरऔरऔर भी

यूं तो इधर सभी ब्रिक देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन) की आर्थिक दशा खराब चल रही है। लेकिन इनमें सबसे खराब हालत भारत की है। इसका पता दयनीयता या मिज़री सूचकांक से चलता है। यह सूचकांक किसी देश में मुद्रास्फीति और बेरोजगारी की दर को जोड़कर निकाला जाता है। भारत का दयनीयता सूचकांक अभी 17.8% (बेरोजगारी दर 8.5% + मुद्रास्फीति 9.3%) है, जबकि ब्राज़ील में यह सूचकांक 10.9% (5.5% + 5.4%), रूस में 10.8% (5.7% + 5.1%)औरऔर भी

चीन में अभी धूप से करीब 5000 मेगावॉट बिजली बनती है। अपने सोलर पैनेल उद्योग के उत्पादन को खपाने के लिए उसने तय किया है कि 2015 तक वह सौर ऊर्जा की क्षमता 35,000 मेगावॉट तक पहुंचा देगा। वहीं, भारत में सौर ऊर्जा की मौजूदा क्षमता 1466 मेगावॉट है। दस साल में 2022 तक इसे 20,000 मेगावॉट तक पहुंचाने की योजना है। देश को परमाणु बिजली का खतरनाक ख्वाब दिखानेवाली यूपीए सरकार को सूरज की रौशनी मेंऔरऔर भी

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की शुरुआत जब 3 जुलाई 1990 को हुई, तब निफ्टी 279 पर था। 23 साल बाद तमाम उतार-चढ़ावों के बाद बावजूद 3 जुलाई 2013 को निफ्टी 5771 पर बंद हुआ। सालाना चक्रवृद्धि दर निकालें तो निफ्टी में लगा धन इन 23 सालों में हर साल 14.08% बढ़ा है। एफडी पर टैक्स के बाद रिटर्न 6-7% से ज्यादा नहीं बनता। शेयर बाज़ार में लंबे समय के निवेश का यही फायदा है। ध्यान दें किऔरऔर भी