आज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और दलाल स्ट्रीट पर्यायवाची हो गए हैं। यहां तक कि पूरे भारतीय शेयर बाजार को अमेरिका के वॉल स्ट्रीट की तर्ज पर दलाल स्ट्रीट कहा जाता है। देश के इस सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंज का जन्म 1875 में एक एसोसिएशन के रूप में हुआ था, जिसका नाम था – नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर एसोसिएशन। लेकिन इसका बीज 1840 में एक बरगद के पेड़ के नीचे पड़ा था। मुंबई के चर्चगेट इलाकेऔरऔर भी

काम ही राम है। केवल चार शब्दों की इस नन्हीं मुन्हीं कहावत में प्रागैतिहासिक युग से भी बहुत पहले की झांकी मिल जाती है कि किसी ईश्वरीय चमत्कार से मनुष्य मनुष्य नहीं बना बल्कि वह मेहनत और काम का ही करिश्मा है कि उसने मनुष्य के अगले दो पांवों को हाथों में तब्दील कर दिया अन्यथा वह अब तक चौपाया का ही जीवन जीता। पांवों का स्थान छोड़कर हाथ स्वतंत्र हुए तो पत्थर फैंकना, लकडी थामना औरऔरऔर भी

रुपया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द ‘रौप्य’ से हुई है, जिसका अर्थ होता है, चांदी। भारतीय रुपये को हिंदी में रुपया, गुजराती में रुपयो, तेलगू व कन्नड़ में रूपई, तमिल में रुबाई और संस्कृत में रुप्यकम कहा जाता है। लेकिन बंगाली व असमिया में टका/टॉका और ओड़िया में टंका कहा जाता है। भारत की उन गिने-चुने देशों में शुमार है जिसने सबसे पहले सिक्के जारी किए। परिणामत: इसके इतिहास में अनेक मौद्रिक इकाइयों (मुद्राओं) काऔरऔर भी

आप सुबह-सुबह फल या सब्जी के किसी थोक बाजार में चले जाएं वहां आपको खरीदार और विक्रेता हाथ को रूमाल से ढंककर सौदे करते हुए मिल जाएंगे। आप ऊपर-ऊपर देखकर समझ ही नहीं सकते कि आखिर हो क्या रहा है। असल में फल और सब्जी के थोक बाजार में इसे रूमाली सौदा कहते हैं और यह अरसे से चला आ रहा नितांत हिंदुस्तानी तरीका है। थोक बाजार में सौदा करते समय खरीदार और विक्रेता आपस में हाथऔरऔर भी

केरल के एरनाकुलम ज़िले में पारावूर तालुका का एक छोटा-सा कस्बा है चेन्नामंगलम। यह एरनाकुलम से करीब 42 किलोमीटर दूर है। तीन नदियों व पहाड़ियों से घिरा है यह हरे-भरे मैदानों से भरा इलाका। उत्तरी पारावूर के इस इलाके में एक सालाना मेला लगता है जिसे मट्टा चांदा कहते हैं। यह मेला ग्राहकों को खींचने के मामले में देश के किसी भी सुपरमार्केट और मॉल को मात दे सकता है। इस मेले की इससे बड़ी खासियत यहऔरऔर भी

इस समय देश भर में जीएसटी (माल व सेवा कर) लागू करने की तैयारियां चल रही हैं। अगले साल 1 अप्रैल 2011 से इसे अपनाने की घोषणा वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी इस साल के आम बजट में कर चुके हैं। कर की समान दरों के बारे में तरह-तरह के प्रस्ताव आ रहे हैं। कोई कहता है कि इसे 12 फीसदी होना चाहिए। ऐसे में हमें एक बार अपने भारतीय मनीषी कौटिल्य की तरफ भी देख लेने कीऔरऔर भी

हम भारतीय किसी भी तरह के ऋण से फौरन बरी होना चाहते हैं। यह हमारी परंपरागत नैतिकता का हिस्सा है। भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि हर व्यक्ति पर कुछ न कुछ ऋण होते हैं। जैसे, मातृ ऋण, पितृ ऋण, गुरु ऋण। इसी तरह महात्मा गांधी का मानना था कि हर व्यक्ति पर समाज का ऋण भी होता है। हमारे जीवन में जो भी सुख-सुविधाएं, उपलब्धियां, यश, प्रतिष्ठा हमें मिलती है, उन सबके लिए हमारे अलावाऔरऔर भी

यह विनोबा भावे द्वारा ऋगवेद के अध्ययन के बाद लिखे गए ऋगवेद सार: का एक मंत्र है। इसका शाब्दिक अर्थ है – लड़के के लिए माताएं वस्त्र बुन रही हैं। पूरी व्याख्या विनोबा जी ने कुछ इस तरह लिखी है। प्राचीन काल में पुरुष खेती का काम करता था और स्त्री घर में बुनती थी। आज पुरुष बुनते हैं और स्त्रियां कांडी भरने का काम करती हैं। यानी, स्त्रियों का स्वतंत्र धंधा चला गया। इस तरह एक-एकऔरऔर भी

इस बार के बजट में कर प्रस्तावों को पेश करते वक्त वित्त मंत्री प्रणब ने कौटिल्य का एक वाक्य उद्धृत किया था कि एक बुद्धिमान महा-समाहर्ता राजस्व संग्रह का काम इस प्रकार करेगा कि उत्पादन और उपभोग पर नुकसानदेह असर न पड़े… वित्तीय समृद्धि दूसरी बातों के साथ लोक समृद्धि, प्रचुर पैदावार और व्यवसाय की समृद्धि पर निर्भर करती है। लेकिन इसके अलावा कौटिल्य या चाणक्य ने कर संग्रह के बारे में एक और दिलचस्प बात कहीऔरऔर भी