ब्रिटेन पर भारी कर्ज, दीवालिया हो चुका है पूरी तरह: जिम रोजर्स

जिम रोजर्स अमेरिकी शेयर बाजार के बड़े नामी सटोरिये हैं। बड़बोलापन उनकी आदत है। लेकिन उन्होंने हाल ही में बिजनेस चैनल सीएनबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में ऐसी बात कही है जो किसी को सिर से पांव तक हिलाकर रख सकती है। उनका कहना है कि, “ब्रिटेन पूरी तरह दीवालिया हो चुका है।” बता दें कि जिम रोजर्स मशहूर निवेशक जॉर्ज सोरोस के साथ जुड़े रहे हैं और निवेश से करोड़ो डॉलर कमा चुके हैं। उनका कहना है कि ब्रिटेन यूरोप का बीमार देश बन चुका है।

ठीक हफ्ते भर पहले 7 दिसंबर को प्रसारित इंटरव्यू में जिम रोजर्स ने कहा, “ग्रीस दीवालिया हो चुका है। पुर्तगाल में तरलता की समस्या है। स्पेन में भी तरलता (लिक्विडिटी) की समस्या है। बेल्जियम लंबे समय से अपने खातों में लीपापोती कर रहा है। इटली भी अरसे से यही कर रहा है और ब्रिटेन पूरी तरह दीवालिया हो चुका है।”

रोजर्स बार-बार चेतावनी देते रहे हैं कि आनेवाले सलों में मुद्रास्फीति और जिंसों के दाम बहुत तेजी से बढ़ेंगे। सीएनबीसी उनसे इंटरव्यू में यह जानना चाह रहा था कि यूरोप के ऋण संकट का अगला चरण क्या होगा। अभी तक ग्रीस और आयरलैंड यूरोपीय संघ से मुक्ति दिलाने की गुजारिश कर चुके हैं। इन देशों के बांड बाजार की हालत देखकर नहीं लगता कि यहां की सरकारें अपने कर्ज उतार पाएंगी। स्पेन पर अभी कर्ज ज्यादा नहीं है, लेकिन बढ़ काफी तेजी से रहा है। डर है कि यूरो जोन की यह चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था भी संकट में पड़ सकती है।

इंटरव्यू में रोजर्स ने कहा, “आयरलैंड को दीवालिया होता है तो हो जाने दीजिए। वो तो दीवालिया हो ही चुका है। आखिर आयरलैंड के नेताओं और बैंकों ने जो गलतियां की हैं, उसकी कीमत मासूम जर्मन, पोलैंडवासी या दूसरे यूरोपवासी क्यों भरे।” रोजर्स की आलोचना भड़कीले बयानों को लेकर होती रही है। लेकिन उनके ताजा बयान को पूरी तरह आधारहीन नहीं माना जा रहा है।

हालांकि ब्रिटिश सरकार के ऊपर ज्यादा ऋण नहीं है और इसकी मात्रा तुलनात्मक रूप से आयरलैंड, ग्रीस व जापान से कम है। लेकिन अगर उपभोक्ता ऋणों को जोड़ दिया जाए तो ब्रिटेन पर चढ़े कुल कर्ज की मात्रा उसके सालाना आर्थिक उत्पादन का 466 फीसदी हो जाती है। यह अनुपात दुनिया में जापान के बाद दूसरे नंबर पर है। जानकारों के मुताबिक ब्रिटेन के बांड बाजार पर इसका ज्यादा असर इसलिए नहीं पड़ा है क्योंकि उसकी ज्यादातर सरकारी प्रतिभूतियां लंबी परिपक्वता अवधि वाली हैं। दूसरे यह भी धारणा है कि ब्रिटिश अर्थव्यवस्था इतनी सक्षम है कि वह हर तरह के सरकारी व उपभोक्ता कर्ज आसानी से उतार लेगी।

स्रोत: this is money

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